भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 20

खण्डनखण्डखाद्य भाषानुवादसहित १अविकल्पविषय एकः स्थाणुः पुरुषः श्रुतोऽस्ति यः श्रुतिषु । ईश्वरमुमया • न परं वन्देऽनुमयापि तमधिगतम् ॥ १ ॥ २मानापनोदनविनोदने गिरीशे भासेव सङ्कुचितयोरुचितं तदिन्दोः । भेत्तुं भवानिशितं दुरितं • भवानि ! नम्रीभवानि घनमङ्घ्रिसरोजयोस्ते ॥ २ ॥ श्रेयो दिशतु स श्रीशः सच्चिदानन्दविग्रहः । यज्ज्ञानाद् विरसायन्ते३ पराचां तु निरुक्तयः ॥ १ ॥ अनुमापतये तस्माय्युमापतये सदा । नमोऽस्तु गुरवे सर्ववेदिनेऽपि द्विवेदिने ॥ २ ॥ श्रीहर्षमिश्रकृतखण्डनखण्डखाद्यभाषानुवादकरणे कृतसाहसोऽहम् । यत्पादपङ्कजपरागनिषेवणेन तान् पूज्यपादगुरुदेववरान् नमामि ॥ ३ ॥ मैं केवल उमा से ही नहीं, किन्तु अनुमा से ( अनुमान से या श्रवण, मनन आदि के पीछे मुझसे ) भी. प्राप्त उस परमेश्वर का वन्दन करता हूँ; जो श्रुतियों में अनेक नाम-रूपों से श्रुत, एक, नित्य और निर्विकल्प-समाधि का विषय है ॥ १ ॥ हे भवानि ! मैं संसार में अनादिकाल से संचित पाप को दूर करने के लिए आपके उन चरण-कमलों में नत होता हूँ, जो मान छुड़ाने के लिए प्रियतम के नत १ यहाँ विरोधाभास अलङ्कार है; क्योंकि जो उमा से अधिगत है, वह ( न + उमा = ) अनुमा से अधिगत कैसे होगा ? इस तरह आपाततः विरोध प्रतीत होता है । जो स्थाणु ( शुष्क वृक्ष ) है, वह पुरुष तथा जो निर्विकल्पक ( प्रकाररहित ) ज्ञान का विषय है, वह श्रुत-ज्ञान का विषय कैसे ? यों आपाततः विरोध का भान होता है । २ यहाँ श्लेष अलङ्कार है । प्रथम पक्ष में 'मानः ( ईर्ष्या ) तस्य अपनোদনं ( दूरीकरणं ) तदेव विनोदः ( क्रीड़ा ) ऐसा समास है । द्वितीय पक्ष में 'मानं ( प्रमाणम् ) अपह्नुते अनेनेति मानापनोदनम् अज्ञानं तस्य विनोदः ( दूरीकरणं ) तत्र नते' ऐसा समास है । ३ पराचाम् = बाह्य पदार्थों का । निरुक्तयः = लक्षण ।