भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 239

विशेषश्च यदि व्यवच्छेदस्तदा निर्विकल्पकाव्याप्तिः । यदि च विश्वव्यावृत्त- स्वरूपप्रकाशात् सोऽपि तथा, तदा दूरे सामान्यप्रत्यक्षस्याप्रत्यक्षत्वापातः, तत्र जगद्वैलक्षण्यप्रकाशे संशयाद्यनुपपत्तेः । यदि तत्रापि प्रतिपत्त्रादिव्यवच्छेदमात्र- प्रकाशाद् विशेषप्रकाशत्वमेव, तदाऽनुमित्यादिव्याप्तिः । चतुर्थ-प्रत्यक्षलक्षण-खण्डनम् अथ इन्द्रियकरणकानुभूतित्वम् । तत्र साक्षात्कारीधीकरणस्यैवेन्द्रियत्वेन अन्योन्याश्रयत्वापत्तिरिति केचित् । तन्न; अज्ञातप्रमाकरणत्वस्य भावत्वविशेषितस्ये- न्द्रियत्वनिरुक्तेः सम्भवात् । विना कार्यगतविशेषसिद्धिं किं प्रति करणत्वमेव ज्ञेयमिति तु बाधः साधीयान् । किञ्च—यदि ‘स्व से जो इतर, उससे व्यवच्छेद’ (भेद) को विशेष कहें, तो निर्विक- ल्पक ज्ञान में अव्याप्ति हो जायगी; क्योंकि उसमें इतर-व्यवच्छेद का भान नहीं होता। यदि इतरव्यावृत्तस्वरूप को विशेष कहें और निर्विकल्पक में इतरव्यावृत्तस्वरूप का भान होने से अव्याप्ति नहीं है—ऐसा मानें, तो भी दूरतः सामान्यरूप से प्रतीत होनेवाले प्रत्यक्ष में अर्थात् ‘चयस्त्विषामित्यवधारितं पुरा’ इत्यादि स्थलों में अव्याप्ति हो जायगी। कारण, वहाँ (सामान्य प्रत्यक्ष में) स्व से इतर यावत् पदार्थ से व्यावृत्तत्व रूप से स्वरूप नहीं भासता । अन्यथा सामान्य प्रत्यक्ष के उत्तर कहीं भी संशय या विपर्यय नहीं होगा । यदि कहें कि किञ्चित् प्रतिपत्ता (ज्ञाता) आदि से व्यावृत्तत्व रूप से स्वरूप की प्रतीति होती है, अतः सामान्यज्ञान प्रत्यक्ष ही है, तो अनुमिति में भी प्रतिपत्त्रादि से व्यावृत्तत्व रूप से ही वह्न्यादि स्वरूप का भान होने के कारण अनुमिति भी प्रत्यक्ष हो जायगी । चतुर्थ प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन समर्थन—कुछ लोग ‘जिस ज्ञान की करण इन्द्रिय हो, वह प्रत्यक्ष है’ इस लक्षण में ‘प्रत्यक्ष ज्ञान का जो करण वह इन्द्रिय है’ ऐसा इन्द्रिय का लक्षण होने से अन्योन्याश्रय दोष देते हैं । किन्तु वह युक्त नहीं, कारण ‘अज्ञात रूप से जो प्रमा की करण हो, वह इन्द्रिय है’ या ‘अज्ञात रूप से भावरूप प्रमा की जो करण हो, वह इन्द्रिय है’ ऐसा इन्द्रिय का लक्षण हो ही सकता है। एवञ्च इस लक्षण में कोई बाधा नहीं। खंडन—यहाँ कार्यभूत प्रमा का भी निवेश है, अतः जबतक प्रमा का ज्ञान न हो, तबतक उक्त लक्षण का ज्ञान नहीं हो सकता। यदि प्रमा का ज्ञान अन्य किसी चिह्न से मानें, तो उसी चिह्न को लक्षण मान लें, यह लक्षण व्यर्थ है । यदि अन्यतः उसका ज्ञान न मानें, तो विशेषण असिद्ध होने से विशिष्ट लक्षण भी असिद्ध ही रह जायगा ।