खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम नियमेनेति चेन्न । विधौ वैयर्थ्यात् । नियमेन निषेधस्य विशेषणे दैवावगते- न्द्रियज्ञानानन्तरजप्रत्यक्षसम्भवादसिद्धिः । विधौ करणत्वप्रविष्ट एवायं नियमो निरुच्यत इति चेन्न । तथापि वैयर्थ्यादेव । अन्यथाऽतिप्रसक्तेर्वैयर्थ्यमिति चेन्न । तथाप्यतिप्रसक्तेरेव । न हि रसादि- साक्षात्कारे रूपादिर्हेतुः । अन्यथासिद्धेनेति चेन्न । तुल्यत्वादनुमानेऽपि । अन्यथासिद्धज्ञान का अविषय हो, वही प्रत्यक्ष है । तब तो धूमज्ञान भी ज्ञातरूप से करण न होने से अन्यथासिद्ध ज्ञान का अविषय है । अतः अनुमिति में अतिव्याप्ति हो जायगी। समर्थन—लक्षण में 'नियम' का निवेश करने पर चक्षुरादि की अनुमिति के उत्तर जायमान घट के प्रत्यक्ष में अव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—'जिस ज्ञान का करण नियम से ज्ञात न हो, वह प्रत्यक्ष है' इस प्रकार नियम ज्ञानरूप विधि ( भाव ) का विशेषण है अथवा 'नियम से जिस ज्ञान का करण अज्ञात है वह प्रत्यक्ष है' इस प्रकार ज्ञात के अभावरूप निषेध का विशेषण है ? यदि नियम को विधि का विशेषण कहें, तो नियम का निवेश व्यर्थ है, क्योंकि नियतपूर्ववर्ती को ही करण कहते हैं । अतः करण के लक्षण में नियम का पहले से ही प्रवेश होने से पृथक् नियम-निवेश व्यर्थ है। 'नियम से जिसका करण अज्ञात हो' यह द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं । कारण, चक्षुरादि की अनुमिति के बाद दैववश ज्ञात घटप्रत्यक्ष में व्यभिचार होने से अव्याप्ति हो जायगी। समर्थन—ज्ञायमानत्व करण का विशेषण है ( उपलक्षण नहीं ), यह बताने के लिए ही 'नियम' पद की सार्थकता है । खंडन—'ज्ञायमानकरणकम्' इतना कहने से ही ज्ञान की विशेषणता भी प्राप्त हो जाती है। तदर्थ 'नियम' पद का प्रक्षेप फिर भी व्यर्थ ही है। समर्थन—करण में ज्ञान को विशेषणमात्र न मानें, तो उपलक्षित ज्ञान में करणत्व का निषेध न होने से इन्द्रिय की अनुमिति के बाद दैववश ज्ञात घट के प्रत्यक्ष में अव्याप्ति हो जायगी। अतः ज्ञान के विशेषणत्वमात्र बोधन के लिए नियम का पृथक् निवेश अवश्य होना चाहिए । खंडन—यदि अवर्जनीय सिद्ध को लेकर भी अति- प्रसक्ति दें, तो रस-साक्षात्कार में रूप भी करण हो जायगा, क्योंकि वह ईश्वर के ज्ञान का विषय होने से नियम से ज्ञात है । अतः रस-साक्षात्कार में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—रस-साक्षात्कार में रूप अन्यथासिद्ध है, करण नहीं । अतः वहाँ अव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—तुल्ययुक्त्या परामर्श भी अनुमिति का ज्ञात करण नहीं है, अतः उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी । यद्यपि परामर्श स्वप्रकाश होने से ज्ञात ही रहता है, तथापि ज्ञातरूपेण कारण न होने से परामर्श का ज्ञान अन्यथासिद्ध है, करण नहीं ।