खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतेनैव प्रमाणेनोपनेयम्, शङ्कायां सत्यां व्याघातात् । यदि च शङ्कां विनाऽपि व्याघातः, तदा शङ्कमानांशङ्कमानयोर्व्याघातस्य साम्यं सिद्धमेव । भवतु शङ्कायामपि तत्प्रमाणम्, किमेतावता ? प्रथमोपजातशङ्कामवलम्ब्य व्यवस्थितस्य व्याघातरूपस्य विशेषस्य दर्शनात् शङ्कान्तरं नोत्पद्यत इति चेन्न । व्याघातसत्ताकाले तदवलम्ब्यया शङ्कयैव शङ्कयमानव्यभिचारता, तस्याः शङ्काया व्युपरमे च तदवलम्बिनो व्याघातरूपस्य विशेषस्याभावात् कः शङ्का- न्तरोत्पत्तेर्वारयितेति वक्तव्यम् । मा नामास्तु तदा व्याघातात्मा विशेषः; तदवगमस्तदाहितो वा संस्कारस्तावद- स्ति । विशेषावगमतत्संस्कारौ च शङ्काविरोधि नौ, न तु स्वरूपेण क्वचिदपि विशेष- स्यावस्थानं तथेति चेन्न । अयावदाश्रयभाविनो विशेषस्य पूर्वस्थितस्य यद्दर्शनं तदाहितो वा संस्कारः, तस्य कालान्तरेऽपि तत्प्रतिधर्मसंशयविरोधित्वे अवयवि- पाकपक्षे कुम्भस्य परमाणुपाकपक्षे परम्परया तदारम्भकस्य परमाणोः पूर्वं श्यामत्या ज्ञातस्य कालान्तरे सम्भावितपाकस्य पाकजन्यरूपविशेषवत्तायां संशयो न स्यात् । अस्तित्व भी उसी प्रमाण से सिद्ध हुआ, क्योंकि शङ्का होने पर ही व्याघात होगा । यदि बिना शङ्का के व्याघात हो, तो जैसे शङ्का करने पर मेरे पक्ष में आप व्याघात देते हैं, वैसे ही बिना शङ्का के आपके पक्ष में हम भी व्याघात दे सकेंगे । समर्थन — शङ्का में भी वह व्याघात ग्राहक प्रमाण रहे, इससे हानि क्या हुई ? प्रथम शङ्का के अवलम्बन से उत्पन्न व्याघातरूप विशेष-दर्शन से ही अन्य शङ्का न होगी और उसीसे व्याप्तिग्रह हो जायगा । खंडन—व्याघात के सत्ताकाल में उसकी अवलम्बभूत शङ्का से ही व्यभिचार की शङ्का है और उस शङ्का का उपरम होने पर उसके अवलम्ब से उत्पन्न व्याघात को अभाव होने से अन्य शङ्का की निवृत्ति कौन करेगा ? समर्थन —उस काल में व्याघातरूप विशेष न रहे, तो क्या हानि है ? व्याघात का ज्ञान या ज्ञान से आहित (कृत) संस्कार ही शङ्का का विरोधी है। स्वरूप से विशेष कहीं भी नहीं रहता । खंडन —यदि यावत् आश्रयकाल में न होनेवाले पूर्वस्थित विशेष के दर्शन को या विशेषदर्शन से जन्य संस्कार को कालान्तर में उत्पन्न उस विशेष के विरोधी धर्मविषयक संशय का विरोधी मानें, तो पूर्वकाल में श्यामत्वरूप से ज्ञात अवयविपाकवादी के मत में कुम्भ में तथा परमाणुपाकवादी के मत में परम्परा से घटारम्भक परमाणु में अन्य काल में पाक से सम्भावित रक्तत्वरूप का सन्देह न होगा ।