भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 288

परिच्छेद ] व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन २७१ अथ तर्कस्य व्याप्तिर्मूलभूताऽभ्युपगम्यते । तत्रापि व्यभिचारशङ्कायां पुन- रनवस्थैव । तत्रापि व्याघातापादने पुनरुत्थितमनवस्थैव । तस्मादस्माभिरप्यस्मिन्नर्थे न खलु दुष्पठा । त्वद्गाथैवान्यथाकारमक्षराणि कियन्त्यपि ॥ ४४ ॥ व्याघातो यदि शङ्काऽस्ति न चेच्छङ्का ततस्तराम् । व्याघातावधिराशङ्का तर्कः शङ्कावधिः कुतः ॥ ४५ ॥ अव्यभिचारश्च एकपरित्यागव्यवच्छेदेनापरान्वयः, समकालदृष्टे नष्टेऽदृष्टः शङ्क्यत इत्याहुः । तर्काभास से व्याघात का परिहार करते हैं, तो हम भी व्याप्तिविहीन उक्त व्याघातरूप तर्क दे ही सकते हैं । यदि तर्क का मूल व्याप्ति को मानें, तो उस मूल व्याप्ति में भी व्यभिचार की शङ्का होने पर अन्य तर्क का आश्रयण करना होगा एवं उस तर्क की मूल व्याप्ति में व्यभिचार की शङ्का होने पर अन्य तर्क का आश्रयण—इस तरह अनवस्था-प्रसङ्ग होगा। यदि कहें कि 'अनवस्था होने पर कहीं भी अनुमान न होने से परप्रतिपत्त्यर्थ वचन में प्रवृत्तिरूप व्याघात होगा, अतः अनवस्था नहीं है', तो जिस तर्क से अनवस्था में व्याघात का आपादन आप करते हैं, उस तर्क के मूल व्याप्ति में भी व्यभिचार की शङ्का होने से पुनः अनवस्था दोष होगा । तस्मात् इस विषय में हम भी कुछ ही अक्षरों को बदलकर तुम्हारी ही गाथा को पढ़ सकते हैं कि 'यदि व्याघात प्रामाणिक है, तो शंका अवश्य है। कारण शंका होने पर ही व्याघात होता है । यदि व्याघात नहीं है, तो प्रतिबन्धक के न होने से अवश्यमेव शङ्का है । शङ्का की अवधि (अवसान) व्याघात कैसे हो सकता है और तर्क शङ्का की अवधि कैसे होगा। कारण तर्क के मूल व्याप्ति में भी शङ्का तदवस्थ ही है । समर्थन—व्यभिचार की शङ्का में अव्यभिचार भी एक कोटि है, कारण शङ्का (सन्देह) उभयकोटिक होती है । अतः किसी अधिकरण में अव्यभिचार का निश्चय होने पर अनुमिति हो जायगी ? यदि अव्यभिचार कहीं भी सिद्ध न हुआ, तो शंका ही अनुपपन्न हो जायगी । खंडन—एक (साध्य) के अभाव के अनधिकरण में हेतु का अन्वय (वृत्तित्व) रूप अव्यभिचार, समकाल में ज्ञात दृष्ट तथा नष्ट दो पदार्थों में है, वहीं शङ्का में अपर कोटि की सिद्धि हो जायगी । यदि कहें कि उसी स्थल में अनुमिति हो जायगी, तो वह युक्त नहीं । कारण ऐसा स्थल कहीं दृष्ट नहीं है ।