भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 29

१२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम प्रमाणानामनादाय न पर्यवस्यति । दूषणानां चास्तित्वेन भङ्गावधारणनियम- बन्धने साधनाङ्गव्याप्त्यादीनां सत्त्वेन तद्विषयस्य तत्त्वरूपताव्यवहारनियमनादौ च कण्ठोक्तमेव तस्य तस्य सत्त्वमङ्गीकृतमिति रिक्तमिदमुच्यते प्रमाणादीनां सत्तामनभ्युपगम्य कथारम्भः शक्यत इति । मैवम् ; एभिरपि बाधकैः कथायामारब्धायामेव अभिमतस्य प्रसाधनीयत्वे पूर्वोक्तबाधायां अनिस्तारात् । न च व्यवहारनियमस्य स्वेच्छास्वीकृतस्यैव प्रमाणादिसत्तास्वीकारपर्यवसायितया नायं दोषः स्यात् । यतः सत्ताज्ञानस्य तत्राङ्गत्वम् , नतु सत्तायाः । तत्र किं सत्तावगममात्रात् सत्ताऽभ्युपगम्येति मन्यसे, अबाधितात् तदवगमाद्वा ? न तावदाद्यः, मरुमरीचिकादौ जलरूपतासद्भावाभ्युपगमप्रसङ्गात् । द्वितीयेऽपि किं वादिप्रतिवादिमध्यस्थमात्रस्य तस्यापि कथाकालमात्र एव यह नियम-बन्ध भी नहीं हो सकता । ऐसे ही दूषण के रहने पर पराजय के अवधारण ( निश्चय ) रूप नियम में और साधनाङ्ग व्याप्ति के सत्त्व से साध्यसत्यत्वा- वधारणरूप नियम में प्रमाण-दूषण-व्याप्ति आदि के सत्त्व का साक्षात् कण्ठ से ही अङ्गीकार किया है । अतः प्रमाण आदि को न मानकर कथारम्भ हो सकता है, यह कथन युक्तिशून्य है । खंडन—इन बाधक युक्तियों से भी कथा का आरम्भ होने पर ही अभिलषित ( प्रमाणादि-स्वीकार की कथाङ्गता ) की सिद्धि हो जायगी । अतः पीछे कहे दोषों का निवारण नहीं हुआ । अर्थात् जिस कथा में प्रमाणादि-सत्ता सिद्ध हुई है, उसीमें व्यभिचार होने और वैसे ही अन्य कथा के भी निर्वाह होने से प्रमाणादि-स्वीकार कथाङ्ग नहीं है । समर्थन—हम किसी कथा में प्रमाणादि-स्वीकार की कथाङ्गता को सिद्ध नहीं करते; किन्तु अपनी इच्छा से स्वीकृत व्यवहार-नियम ही प्रमाणादि-स्वीकार में पर्यवसित ( प्राप्त ) हो जाता है, यह आपसे कहते हैं । खंडन—उक्त प्रकार से भी प्रमाणादि-सत्ता का ज्ञान ही कथाङ्ग हुआ, सत्ता नहीं । समर्थन—यदि प्रमाणादि-ज्ञान कथाङ्ग हुआ, तो उस ज्ञान का विषय होने से प्रमाणादि-सत्ता भी कथाङ्ग हो ही गयी । खंडन—आप प्रमाणादि-ज्ञानमात्र से प्रमाणादि को स्वीकार करते हैं या अबाधित प्रमाणादि के ज्ञान से ? इनमें प्रथम पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि मरु-मरीचिका में जल का ज्ञान होने से उसका ( जल का ) भी स्वीकार करना