भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] उपाधि-लक्षण का खण्डन २७३ सम्बन्धिनोर्व्यापकयोः सम्भावितसम्बन्धाधिकदेशकालतया एकसम्बन्धिदर्शने- ऽपरानुमानाय नियामकत्वायोगात् । नापि पञ्चमः ; 'न प्रयुक्तः' इति यदि न जनितस्तदा सम्बन्धस्याकृतकत्वपक्षे 'अन्येने'ति विशेषणवैयर्थ्यम्, अकृतकस्य सम्बन्धिस्वभावेनाऽप्यजनितत्वात् । सम्बन्धस्य कृतकत्वपक्षे स्वरूपासिद्धिरेव स्यात् । सामग्र्याः सर्वसम्भवादन्ततः कालदेशादृष्टादिभिरपि तज्जन्यत्वस्यावश्यकवक्तव्यत्वात् । नापि षष्ठः पक्षः ; तस्य निर्वक्तुमशक्यत्वात् । एवमेव विकल्प्यायं चरमविकल्पः सर्वत्रोपन्यस्य दूष्यो न्यूनत्वशङ्काभयादिति । उपाधि-लक्षण-खण्डनम् अनौपाधिकः सम्बन्धो व्याप्तिरित्यपरः । स प्रष्टव्यः—कोऽयमुपाधिर्नाम, यच्छून्यत्वमनौपाधिकत्वम् ? अर्थात् व्याप्ति के लक्षण में व्याप्ति का प्रवेश होने से आत्माश्रय दोष हो जायगा । किञ्च—यदि सम्बन्ध को व्याप्य मानेंगे, तो व्यापक सम्बन्धी अधिक देश-कालवृत्तित्व से सम्भावित है । अतः एक सम्बन्धी के दर्शन से अन्य सम्बन्धी की अनुमति नहीं होगी । पञ्चम पक्ष भी युक्त नहीं है । कारण यदि 'अन्य से प्रयुक्त नहीं है' इसका 'अन्य से जनित नहीं है' यह अर्थ करें, तो 'सम्बन्ध अकृतक (नित्य) है' इस पक्ष में 'अन्य से' यह विशेषण व्यर्थ है। कारण जो अकृतक है, वह सम्बन्धी के स्वभाव से भी अजन्य है । यदि 'सम्बन्ध कृतक है' यह पक्ष मानें, तो 'सम्बन्धी के स्वभाव से प्रयुक्त न हो' यह स्वरूप ही असिद्ध है । कारण कार्यमात्र सामग्री से जन्य होता है । अतः देश, काल, अदृष्ट आदि से वह व्याप्तिरूप सम्बन्धप्रयुक्त है, यह अवश्य मानना होगा । षष्ठ पक्ष भी युक्त नहीं है, कारण उसका निर्वचन नहीं हो सकता । इस रीति से विकल्प कर इस चरम विकल्प का सर्वत्र खण्डन करना चाहिए । अन्यथा न्यूनता हो जायगी । अर्थात् यदि वादी विकल्पित पक्षों से भिन्न पक्ष का आश्रयण करे, तो विकल्प में न्यूनता हो जायगी । किन्तु यदि 'उक्त से अन्यत्व' रूप से भी विकल्प कर दें, तो वादी से अवलम्बित पक्ष का उसमें अन्तर्भाव हो जाने से न्यूनता नहीं होगी । उपाधि-लक्षण का खण्डन अन्य आचार्य कहते हैं कि उपाधिरहित सम्बन्ध व्याप्ति है । उनसे पूछना चाहिए कि वह उपाधि क्या वस्तु है, जिससे शून्य को आप व्याप्ति कहते हैं ? साथ ही ३५