भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

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२७६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्यं [ प्रथम त्वापत्तेः । न द्रक्ष्यत इति च निरूपयितुमशक्यम् , व्याप्तिग्रहकाले च साध्यत्वा- भावेन तदव्यभिचारः कथमवधार्यः ? साध्यं व्यापकमपेक्षितमिति चेन्न । व्याप्त्यनवगमे व्यापकार्थानवगमात् । सम्भावितव्यापकभावो व्यापकोऽपेक्षित इति चेन्न । व्यापकस्यानिरुक्तौ किंरूप- तया सम्भावनाऽपि स्यात् । अथ साध्यव्यापक इत्येव भद्रम्, तदानीं साध्यत्वाभावेऽपि साधयितुमर्हत्वस्य विवक्षितत्वात् । न; कथं ह्यवगन्तव्यमिदमेव साधयितुमर्हमिदं नेति । व्यापकत्वादिति वक्तुमशक्यत्वात् । तो वह्नि से धूम के साधनस्थल में 'आर्द्रेन्धन-संयोग भी उपाधि न होगी । कारण 'आर्द्रेन्धनसंयोग में धूमरूप साध्य का व्यभिचार नहीं देखा जायगा, इसमें कोई प्रमाण नहीं है । अर्थात् कालान्तरभावी व्यभिचार संप्रति ज्ञेय न होने से सुतरां उसका अभाव दुर्निरूप्य हो जायगा । किञ्च—व्याप्तिग्रहकाल में साध्यत्व ( सिद्धिकर्मत्व ) ही न होने से साध्य के साथ व्यभिचार का अभाव भी कैसे जाना जायगा ? समर्थन—साध्यत्व सिद्धिविषयत्व नहीं, किन्तु व्याप्तिंकर्तृत्व ( साध्य का व्यापकत्व ) ही है । एवञ्च उसका व्यभिचार व्याप्तिग्रह-काल में भी निरूप्य हो ही सकता है । खंडन—यह भी नहीं कह सकते, कारण जबतक व्याप्ति का ज्ञान न हो, तबतक व्यापकत्व का ज्ञान भी अशक्य है । 'जिसके व्यापकत्व की सम्भावना हो, वह व्यापक है' यह कथन भी युक्त नहीं। कारण जबतक व्यापकत्व की निरुक्ति न हो, तबतक उसकी सम्भावना भी कैसे होगी ? समर्थन—'साध्यव्यापक' ही युक्त है, कारण व्याप्तिग्रह-काल में साध्यत्व का अभाव होने पर भी साधन-योग्यता तो है ही। हम साध्यत्व सिद्धिविषयत्व नहीं, किन्तु तद्योग्यता ही मानते हैं, जो यावद्द्रव्यभावी है। खण्डन—यह कथन भी युक्त नहीं । कारण व्याप्ति के अज्ञान-काल में यह कैसे जाना जायगा कि यह साधन-योग्य है और यह साधन-योग्य नहीं है । व्यापकत्व से साध्य का निश्चय नहीं हो सकता । अर्थात् व्याप्य-व्यापकभाव धूम-वह्नि का साध्य-साधनभाव नहीं कहा जा सकता । कारण जबतक व्याप्ति का लक्षण न हो, तबतक यह व्याप्य है और यह व्यापक—यह निश्चय कैसे होगा ?