खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 329, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ें३१२ | सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य | [ प्रथम
न यदि, तदा सन्निकर्षस्य हेतुतैव कुतो मन्तव्या, अन्यथैव कार्योत्पत्त्युपपत्तेः। एष्टव्यं चेत्तर्हि तत्रैवोदाहरणे व्यवधायकेनेन्द्रियसन्निकर्षशून्ये परमार्थतश्चाभाववति उक्तकारणसम्पत्तेरभावप्रमा स्यात्। तत्र व्यवधायकाभावः प्रतियोग्युपलम्भको नास्तीति चेन्न। सन्निकर्षस्य प्रमा- व्यतिरेकप्रयोजकत्वावधारणोदाहरणमेव तर्हि तन्न स्यात्। व्यवधायकस्य सन्निकर्ष- विरोधिनैव प्रमाविरोधित्वमिति चेत्; तर्हि व्यवधायकाभावः सन्निकर्षोत्पत्तौ कारणम्, न त्वभावप्रमाविशेषोत्पत्ताविति स्थिते स प्रसङ्गस्तदवस्थ एव। न च सन्निकर्षाभावादेव तदानीमुक्तकारणासम्पत्तिः, प्रतियोगिसन्निकर्षस्य अभावप्रमोत्पादकत्वे नित्यं तदनुत्पत्त्यापत्तेः। को आप प्रतियोगी के उपलम्भ में हेतु मानते हैं। वहाँ सन्निकर्ष के अभाव में प्रति- योगी की अप्रत्यक्षता इष्ट है या नहीं? यदि नहीं, तो सन्निकर्ष की हेतुता ही सिद्ध कैसे होगी, कारण सन्निकर्ष के बिना भी कार्य की उत्पत्ति हो गयी। यदि उक्त स्थल में अप्रत्यक्ष इष्ट हो, तो उसी उदाहरण में व्यवधायक के होने पर इन्द्रिय-सन्निकर्ष नहीं है और वस्तुतः अभाव और उक्त योग्यता भी है। अतः वहाँ अभाव-प्रमा होनी चाहिए। समर्थन—वहाँ व्यवधायकाभावरूप प्रतियोगी के उपलम्भ का कारण नहीं है, अतः उक्त योग्यता के न होने से अभाव की प्रमा नहीं होती। खण्डन—यदि व्यव- धायकाभाव को कारण मानें, तो उक्त स्थल सन्निकर्ष के अभाव से प्रतियोगी की प्रमा के अभाव का उदाहरण नहीं हुआ। एवञ्च सन्निकर्ष की हेतुता सिद्ध नहीं होगी। यदि कहें कि व्यवधायक सन्निकर्ष का विरोधी होने से प्रमा का विरोधी है, तो व्यव- धायक का अभाव सन्निकर्ष की उत्पत्ति में कारण है, प्रतियोगी की प्रमा में नहीं। अतः उक्त स्थल में अभाव की प्रमा क्यों नहीं होती, यह आपत्ति वैसी ही बनी रही। समर्थन—प्रतियोगी का सन्निकर्ष प्रतियोगी का व्याप्त नहीं है, कारण अंशतः एक है और स्व से स्व व्याप्त नहीं होता। अतः तत्-तत् अविनाभूत से अन्य प्रति- योगी के प्रमापक साकल्य के मध्य प्रतियोगी का सन्निकर्ष भी आता है और उक्त स्थल में वह नहीं। अतः वहाँ अभाव की प्रमा नहीं होती। खण्डन—प्रतियोगी का सन्निकर्ष अभाव-प्रमा का कारण नहीं है; क्योंकि यदि उसे कारण मानें, तो प्रति- योगी के सन्निकर्षस्थल में नियमतः अभाव का ही ग्रहण होने लगेगा।