भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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१८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अविशेषेण नियम्यनियामकव्यवस्थानुपपत्तेः । तस्माद् अन्यदास्थायाः सामग्र्याः तदा कार्यजन्मनियमोऽभ्युपेयस्तथादर्शनादित्येव वाच्यम् । तथा च समः समाधिः । तथापि कार्यजन्मकालस्य को विशेषः ? कार्यजन्मैव । अन्यथा यद् विशेषान्तरं तदपि विशेषान्तरवतः कालस्य स्यादित्यपर्यवसानमेव पर्यवस्येत् । तथापि तत्कालस्यानुगतं किं रूपमिति चेन्न । रूपान्तरवतोऽपि किं तदित्यस्यापि पर्य्यनुयोगस्यापत्तेः । 'सामग्र्युत्तरक्षणत्व और कार्यक्षणत्व दोनों शब्दों का घट, कलश शब्दों की तरह एक ही अर्थ है, अतः नियम्य-नियामकभाव नहीं हो सकता । या किसीसे अनियमित आकस्मिक सामग्री अपने उत्तरत्व से कार्य के जन्म का नियमन नहीं कर सकती । यदि सामग्री का नियामक अन्य सामग्री को मानें, तो उस नियामक का अन्य नियामक और उसका भी अन्य नियामक— इस रीति से अनवस्था हो जायगी । तस्मात् यही आप कहेंगे कि पूर्वक्षणवर्त्ती सामग्री ही उत्तरक्षणवर्ती कार्य-जन्म की नियामक होगी । क्योंकि सामग्री से उत्तरक्षण में कार्यजन्म देखा जाता है । तब तो समाधान तुल्य है, अर्थात् हम भी कह सकते हैं कि अन्य काल में स्थित भी कारण का असत्त्व उस काल में कार्यजन्म का नियामक है; क्योंकि उसी काल में कार्य-जन्म देखा जाता है । यहाँ यह न भूलना चाहिए कि शून्यवाद में एकमात्र ज्ञान असत् होता हुआ भी स्वविषय ( घटादि ) के व्यवहार का कारण है । अन्य कारण तो प्रातिभासिक सत्ता से युक्त होकर ही प्रातिभासिक कार्य के कारण हैं । स्वव्यवहार में तो ज्ञान भी प्रातिभासिक सत्तायुक्त ही कारण है, असत् नहीं । शङ्का—तब भी अन्य क्षणों से कार्य-जन्म के क्षणों में क्या भेद है ? समाधान—अन्य क्षणों में कार्य का जन्म नहीं होता, उसी क्षण होता है, यही अन्य क्षणों से कार्य-जन्मक्षण में विशेषता है । अन्यथा कार्यजन्म से अन्य 'सामग्र्यव्यवहितोत्तरत्वादि' कोई विशेषता कहें, तो वह भी अव्यावर्त्तक होने के कारण निर्विशेष काल में नहीं कहेंगे, किन्तु सामग्रीयुक्त काल में ही कहेंगे। इस रीति से उत्तरोत्तर सामग्री के आश्रयण में अनवस्था हो जायगी । शङ्का—तब भी कार्य-जन्म के काल का अनुगत रूप क्या है ? समाधान—कार्य-जन्म का सम्बन्ध ही काल का अनुगत रूप है। अन्यथा