भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 36

न च सत्ताभेदानन्त्यमस्त्येवेत्यपि पादप्रसारिका निस्ताराय । सत्ताभेदे हि सद्बुद्धिव्यवहारानुगम¹-समर्थनलंघिनः प्रथमापि सत्ता न स्यादिति वृद्धिमित्छतो मूलमपि ते नष्टमिति हा² कष्टतरम् । न च स्वरूपसत्तोपगमाय स्वस्ति, भिन्नानपि अनुगतबुद्ध्याधानपदेऽभिपिप्सता हुआ। रही द्वितीय सत्ता, उसका कारण-कोटि में निवेश है या नहीं ? यदि नहीं, तो असत् ही कारण रहा। क्योंकि जैसे धूम में विद्यमान भी कृष्णत्व हेतुदल में अनिविष्ट होने से हेतुता में अनुपयोगी है, वैसे ही प्रथम सत्ता से विशिष्ट कारण में विद्यमान भी द्वितीय सत्ता—कारणकोटि में निविष्ट न होने से—कारण के सत् होने में उपयोगी नहीं है। यदि द्वितीय सत्ता का कारण- कोटि में निवेश करें, तो यह विकल्प होता है कि द्वितीय सत्ता से विशिष्ट कारण में सत्ता है या नहीं ? यदि नहीं, तो कारण असत् ही रहा। यदि है, तो पूछा जा सकता है कि द्वितीय सत्ता से विशिष्ट में द्वितीय सत्ता ही रहती है अथवा प्रथम सत्ता या तृतीय सत्ता ? यदि द्वितीय सत्ता ही रहती है, तो आत्माश्रय, प्रथम सत्ता रहती है तो अन्योन्याश्रय³ और तृतीय सत्ता रहती हो, तो इस तरह अनन्त सत्ता मानने से अनवस्था होगी । समर्थन—⁴सत्ता में सत्ता इस प्रकार अनन्त सत्ताएँ इष्ट ही हैं अर्थात् अनुभवसिद्ध होने के कारण बीजांकुर के तुल्य यहाँ अनवस्था दोष नहीं है। खण्डन—इस तरह पैर फैलाने से भी निर्वाह नहीं होगा। क्योंकि अनन्त सत्ताएँ मानने पर 'सत्' इत्याकारक अनुगत प्रतीति प्रमाण न होने से प्रथम सत्ता भी सिद्ध नहीं हुई। शोक ! व्याज चाहनेवाले आपका मूल-धन भी नष्ट हुआ । समर्थन—हम जातिरूप सत्ता को नहीं, स्वरूपसत्ता को मानते हैं। अर्थात् घटादि स्वरूप से ही सत् हैं। अतएव अनवस्था दोष नहीं है। खण्डन— १ 'अनुगमननिबन्धने'ति विद्यासागरीपाठः । २ 'हा' विद्यासागर्यां इति नास्ति । ३ अन्योन्य की स्थिति या ज्ञान में अन्योन्य का आश्रय 'अन्योन्याश्रय' है । 'भूतल में घट है और उसी घट में वही भूतल है' ऐसा प्रयोग न होना ही इसके दोषत्व का कारण है । ४ यद्यपि इस शास्त्रार्थ में नैयायिक प्रतिवादी हैं और वे सत्ता में सत्ता अथवा स्वरूप- सत्ता को नहीं मानते । अतः उनके द्वारा ऐसी शंकाएं नहीं हो सकतीं । यदि वे ऐसी शंकाएँ करें, तो 'अपसिद्धान्त' कहकर ही उनका खण्डन उचित है । फिर भी खण्डनकार ने अपनी विद्वत्ता दिखलाने के लिए ही स्वयं शंका कर उनका खण्डन किया है ।