खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] प्रतिज्ञा-विरोध-लक्षण का खण्डन ३८६ मा प्रमायि, अप्रमायैव तद्व्यवहार इति चेन्न । कचिदप्यप्रमितमाभास- मात्रोपस्थितं क नाम नोपस्थापयितुं शक्यमित्युक्तैवातिव्याप्तिगर्वतते । अनेकत्र नियतयोरेकत्र प्रसञ्जनमिति चेन्न । प्रसञ्जकस्य तद्द्वयस्यैकत्र स्थितिनियतताप्रमितावविरोधस्यानेवंभवे चाऽनापादकत्वस्याऽऽपत्तेः । एकैकव्याप्याभ्यां पृथक् पृथक् तद्द्वयापादनमिति चेन्न । एकैकमव्याघातात् । अर्थाद् द्वयं स्यादिति चेन्न । अर्थापत्त्यर्थत्वेनाव्याघातात् । अर्थादापादनम् , न साधनमिति चेन्न । मिथो विरोधित्वेन तर्काभा- सत्वापत्तेः, इष्टापादनाच्च । समर्थन—प्रमित न हो, तो क्या हानि है, पर का जो अभ्युपगम है, उसीसे प्रसञ्जन होगा, जैसा कि भ्रम के 'नेदं रजतम्' इस बाध में शुक्ति-रजततादात्म्य प्रतियोगीरूप से भासता है । खण्डन—अप्रमित और केवल भ्रम से उपस्थित व्याघात का प्रसञ्जन कहाँ नहीं होता, अर्थात् सर्वत्र हो सकता है । अतः 'घटो नास्ति' इस वाक्यस्थल में भी उसका प्रसञ्जन होने से पूर्वोक्त अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है । समर्थन—वन्ध्या में वन्ध्यात्व और माता में मातृत्व प्रमित है, उन दोनों के एक धर्मी में [ 'वन्ध्या-माता' इस वाक्य में ] प्रसञ्जक के बल से प्रसञ्जन करेंगे । खण्डन—दो विरुद्ध धर्मों का एक में प्रसञ्जन बिना किसी प्रसञ्जक के हो नहीं सकता । उस प्रसञ्जक में यदि प्रसञ्ज्यद्वय की व्याप्ति प्रमित है, तो उन दोनों के एकत्र प्रमित होने से वस्तुतः विरोध ही नहीं है, केवल विरोध की परिभाषामात्र है । यदि व्याप्ति प्रमित नहीं है, तो वह आपादक ही नहीं हो सकता । समर्थन—एक-एक के व्याप्य दो प्रसञ्जकों से मिलित दोनों का आपादन नहीं होता, किन्तु पृथक्-पृथक् दोनों का आपादन होता है । खण्डन—ऐसा होने पर दोनों एकत्र साधक तो हैं नहीं, अतः व्याघात ही नहीं होगा । समर्थन—दोनों के व्याप्यों से एक-एक का अवस्थान होने पर अनुपपत्ति से ही दोनों की एकत्र अवस्थिति होने से व्याघात है । खण्डन—प्रत्येक दोनों के एकत्र आपादन की अनुपपत्ति से आप उन दोनों की अवस्थिति का एकत्र साधन करते हैं या आरोपमात्र ? प्रथम पक्ष में उक्त अनुपपत्ति अर्थापत्तिरूप प्रमाण होने से उससे प्रमित विरुद्धद्वय का एकत्र अवस्थान रूप-रस के तुल्य व्यहत ही नहीं है । यदि कहें कि अनुपपत्ति से प्रसञ्जनमात्र करते हैं और प्रसञ्जन में प्रमा की अपेक्षा नहीं, कारण प्रसञ्जन ज्ञानमात्र से ही होता है, अतः पूर्वोक्त दोष नहीं है,