खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 449, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंसम्बन्धो हेतुः ; स च तदधिकरण एवेति चेन्न । सम्बन्धात्तदधिकरण- सम्बन्धान्यत्वापत्तेरित्येष न पन्थाः । तत्सम्बन्धिनि तत्र व्यवहार इति चेन्न । तस्यापि विशिष्टत्वेनान्यत्वापत्तौ व्यवहारविषयगतविशेषस्य वक्तुमशक्यत्वात् । एवं परम्पराकल्पनायामप्यनवस्थामात्रम् , न तु व्यवहार्यगतो विशेषः कश्चित् । विशेषण-विशेष्य से शून्य विशिष्ट उपलक्ष्य है या प्रकृत विशेषण-विशेष्य से घटित ? प्रथम पक्ष मे 'दण्डिनमानय' ऐसा कहने पर कुण्डली की प्रतीति या आनयन होना चाहिए । द्वितीय पक्ष में विशिष्ट के अन्य होने से विशेषण-विशेष्य में विशिष्ट का व्यवहार नहीं होना चाहिए । समर्थन—सम्बन्ध विशिष्ट की प्रतीति या व्यवहार में हेतु है और वह विशेषण- विशेष्य उभयाश्रित है । अतः विशिष्ट-व्यवहार विशेषण और विशेष्य, दोनों को ग्रहण कर ही होता है । खण्डन—केवल सम्बन्ध अतिप्रसक्त होने से विशिष्ट-व्यवहार का हेतु नहीं हो सकता, किन्तु दण्डादिरूप अधिकरण से विशिष्ट सम्बन्ध ही हेतु है । दण्डाधि- करणविशिष्ट सम्बन्ध विशिष्ट होने से सम्बन्ध से अन्य है और विशिष्ट-व्यवहार का हेतु उक्त विशिष्ट का अधिकरण—अंशतः आत्माश्रय होने से—विशेषण-विशेष्य है नहीं । अतः विशिष्ट-व्यवहार विशेषण, विशेष्य दोनों में नहीं होगा । तस्मात् विशिष्ट अन्य है—यह कथन युक्त नहीं है । समर्थन—यद्यपि विशिष्ट विशेषण-विशेष्यसम्बन्ध से अन्य है, तथापि विशेषण- विशेष्य का सम्बन्धी है, अतः विशिष्ट-व्यवहार विशेषण और विशेष्य उभय को ग्रहण कर ही होता है । खंडन—विशिष्टमात्र तो दण्ड-पुरुष का सम्बन्धी है नहीं, किंतु दण्ड- पुरुषीयत्व-विशिष्ट ही विशिष्ट दण्ड-पुरुष का सम्बन्धी है । वह अन्य है । अतः दण्ड- पुरुषीयत्वविशिष्ट में जो व्यवहार होता है, वह भले ही दण्ड-पुरुष का आदान करके हो । केवल दण्डीरूप विशिष्ट में जो व्यवहार होता है, वह दण्ड-पुरुष में कैसे होगा ? समर्थन—'दण्डी पुरुषः' इस विशिष्ट का सम्बन्धी दण्ड-पुरुषीयत्व से विशिष्ट विशिष्ट है और उसका सम्बन्धी दण्ड-पुरुष है । अतः परम्परया विशिष्ट का सम्बन्धी दण्ड-पुरुष भी होने से विशिष्ट में दण्ड-पुरुष का ग्रहण करके ही व्यवहार होगा ।