खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ न च 'घटपटावि'त्यपि विशिष्टमेव, स्वतन्त्रयोः घटपटयोः परस्परासम्बन्धयो- स्तत्र व्यवहारात्, न पुनर्यथा 'दण्डी पुरुषः', तथा 'घटी पटः, पटो घट' इति वा तत्र व्यवहारः । न चैकज्ञानाद्यारूढतैव तयोर्न मन्तव्या, यतो 'घटपटावि'ति द्वित्वं तयोस्तद्- द्वयानवगाहिना कथं विज्ञानेनावगाह्येतेति प्रत्यभिज्ञाप्रस्तावोक्तान्दोषानाह्वास्यामः। अत एव अविरलनानाज्ञानारूढताऽपि विशिष्टता निरवकाशा । अथाप्रकाशमानासम्बन्धोऽनेक एकबुद्ध्यारूढस्तथा, नचैवं घटपटौ । तत्कथ- मुक्तदोषापत्तिरिति चेन्न । अप्रकाशमानोऽसम्बन्धो ययोरित्ययमप्यर्थो विशकलित इति घटत्वपटत्वव्यक्त्यादिवैशिष्ट्यमपि तत्र भज्येताविशेषात् । अथ धर्मधर्मिसम्बन्धाः स्वतन्त्रा एवैकबुद्ध्यारूढास्तथा । न च घटपटौ धर्मधर्मिरूपावित्यनतिप्रसंग इति चेन्न । धर्मत्वस्यैकस्य दण्डादिगुणादिसाधारणस्य घट पटविशिष्ट ही है, ऐसा नहीं मान सकते। कारण स्वतन्त्र (परस्पर असम्बद्ध) ही घट-पट का वहाँ व्यवहार होता है। जैसे 'दण्डी-पुरुषः' यह व्यवहार होता है, वैसे ही 'घटी पटः', 'पटी घटः' ऐसा व्यवहार नहीं होता । समर्थन— घट, पट दोनों एकज्ञान के विषय नहीं होते। खंडन— तब तो घट, पट दोनों को विषय न करनेवाले विज्ञान का विषय उभय-गत द्वित्व कैसे होगा? उक्त इस प्रकार प्रत्यभिज्ञा के खण्डन के प्रकरण के ही दोष आहूत होंगे— वे दोष उपस्थित हो जायेंगे। इसीलिए 'अव्यवधान से उत्पन्न नानाज्ञानविषय अनेक और सम्बन्ध विशिष्ट हैं'— यह लक्षण भी खण्डित जानना चाहिए। समर्थन— 'अप्रकाशमान है असम्बन्ध जिनका, ऐसे एकबुद्धि के विषय अनेक विशिष्ट हैं।' घट-पट का असम्बन्ध प्रकाशित है, अतः 'घटपटौ' इत्याकारक समूहा- लम्बन ज्ञान के विषय घट-पट में विशिष्ट-लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन— 'अप्रकाशमान है असम्बन्ध जिनका' यह अर्थ स्पष्ट नहीं है । किसका किसमें असम्बन्ध अप्रकाशित हो, यह स्पष्ट कहना चाहिए । अतः घटत्व का पट में तथा पटत्व का घट में असम्बन्ध अप्रकाशित होने से घटत्वविशिष्ट घट, पटत्वविशिष्ट पट में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन— 'जहाँ धर्म, धर्मी और सम्बन्ध तीनों स्वतन्त्र (विशिष्ट के अधिशेषण) रूप से एकबुद्धि के विषय हों, वह विशिष्ट है।' घट और पट परस्पर धर्म-धर्मिभावापन्न