खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ व्यतिरेकेण निर्वक्तुमशक्यत्वात् । अत एवाधःशब्दार्थस्य दुर्वचत्वमधिगम्य अद्वैतवादिना गुरुणा शिष्याय खण्डनमुपाचक्षाणेन भगवता पराशरेणाभिहितम्— ‘अधःशब्दनिगद्यं किं किञ्चोर्ध्वमभिधीयते ।’ पृथिव्यभिमुखी दिगधःशब्दार्थ इति चेन्न । ऊर्ध्वशब्दार्थस्यापि पृथिव्यभि- मुख्यत्वसम्भवात् । यदपेक्षया पृथिव्यभिमुखी या दिक् तदपेक्षया साऽध इति चेन्न । यदपेक्ष- येति किं यमवधीकृत्येति विवक्षितम्, उत यदीयाभिमुख्यव्यवस्थितेति ? आद्ये पृथिव्यूर्ध्वस्थितं पदार्थमवधीकृत्य योर्ध्वा दिगिति भवद्भिर्व्यवह्रियते, साऽपि पृथि- व्यभिमुखी भवतीति साऽप्यधः स्यात् । अत एव न द्वितीयोऽपि । खण्डन—गमन से अधिक पतन-पदार्थ का अधःशब्द के निर्वचन के बिना निर्वचन ही नहीं हो सकता । अर्थात् अधःसंयोगानुकूल व्यापार ही पतन-पदार्थ होने से जबतक अधःशब्द के अर्थ का निर्वचन न हो, तबतक पतनार्थ का निर्वचन नहीं हो सकता । फलतः अन्योन्याश्रय हो जायगा । अधःशब्दार्थ को दुर्वच जान- कर ही अद्वैतवादी गुरु ऋभु ने शिष्य निदाघ को जो खण्डन का उपदेश किया था, उसी- का अनुवाद करते हुए पराशर मुनि ने कहा है कि ‘अधःशब्द का क्या अर्थ है और ऊर्ध्व शब्द का क्या अर्थ है ? कुछ नहीं, अर्थात् अधः-ऊर्ध्वशब्दार्थ अनिर्वचनीय हैं ।’ समर्थन—‘उपरिस्थित पदार्थ की अपेक्षा पृथिवी की अभिमुख दिशा अधःशब्द का अर्थ है ।’ खण्डन—‘ऊर्ध्व’ शब्द का अर्थ भी पृथिवी की अभिमुख दिशा ही है, अतः उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी । अर्थात् एक-एक ऊर्ध्वदेश से दूसरा ऊर्ध्वदेश पर होता ही है । एवञ्च ऊर्ध्वदेश भी ऊर्ध्वदेशान्तर की अपेक्षा पृथिवी के अभिमुख है ही, अतः वहाँ अतिव्याप्ति है । समर्थन—‘जिन मार्तण्ड-मण्डलादि की अपेक्षा पृथिवी की अभिमुख जो दिशा हो, उसकी अपेक्षा वह दिशा अधःशब्द का अर्थ है ।’ एवञ्च अतिव्याप्ति नहीं है, पूर्व पूर्व दिशा को उत्तरोत्तर की अपेक्षा अधोरूप हम मानते ही हैं । खंडन—यहाँ ‘अपेक्षा’ शब्द का क्या अर्थ है, अवधिमात्र अर्थ है या अभिमुख ? प्रथम पक्ष में पृथिवी के ऊपर स्थित जो घटादि पदार्थ हैं, तदवधिक अभिमुखत्व ऊर्ध्वस्थित मार्तण्ड- मण्डल को भी है । अतः उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी । द्वितीय पक्ष में भी मार्तण्ड-मण्डल से ऊर्ध्वदेश भी अधः कहा जायगा । कारण उसमें पृथिवी का जैसा आभिमुख्य है, वैसे ही मार्तण्ड-मण्डल का भी आभिमुख्य है ।