भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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३४ ] सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम न च तैर्दोषैर्नास्त्येव ज्ञानमित्यास्थेयम्, स्वतः सर्वसिद्धस्य दुरुपह्नवत्वात् । स्वप्रकाशाङ्गीकारादेव चाऽनुभवस्य सर्वदोषहानेर्वक्ष्यमाणत्वात् । प्रकाशात्ममात्रस्यैव स्वतःसिद्धिसम्भवे जडात्मनां धर्माणां केषामपि तदन्तर्भावानुपपत्तिः । अत एव धर्मोपग्रहप्रवर्त्तिष्णुवाग्व्यवहाराविषयत्वम्, कालानवच्छेदमादाय च नित्यत्वोपचारः । देशानवच्छेदमादाय विभुत्वव्यपदेशः । प्रकारावच्छेदविग्रह- निबन्धनश्च सर्वात्मत्वाऽद्वैतादिव्यवहारः । सौगतप्राभाकरादिवद् भावे, नैयायिक- वच्च अभावे अभावानतिरेकस्वीकारादेव चाद्वैताऽव्याघातः । भ्रमविषयनिषेधस्य च प्रतियोगिनः सर्वथैवासिद्ध्याऽपि न काचित् क्षतिः । तदेतत्तु श्रुत्या प्रमाणेनोपलक्षणन्यायात् तात्पर्यतः प्रकाश्यते । तेन पदार्थों में अन्तर्भाव न होने से विषय-विषयीभाव असम्भव है, अतः वह भी नहीं हो सकता । ज्ञान असम्बद्ध का ही ग्रहण करता है, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि यदि ज्ञान असम्बद्ध का ग्रहण करे, तो अन्य का भी ग्रहण हो जाय । प्रश्न — उक्त दोषों से ज्ञान भी नहीं है, ऐसा ही क्यों न मानें ? उत्तर — ज्ञान सब मनुष्यों के अपने अनुभव से ही सिद्ध है, अतः उसका अस्वीकार नहीं हो सकता । स्वप्रकाश होने से ही अनवस्था, असम्बन्ध आदि दोष नहीं होते, यह आगे ‘तत्स्वप्रकाशपरमार्थचिदेव’ आदिसे ( २६ वीं कारिका से ) कहेंगे; एकमात्र अभानापादक अज्ञान का विरोधी ज्ञान ही स्वतःसिद्ध हो सकता है और जडात्मक कोई भी अन्तःकरणधर्म उपर्युक्त प्रकाशात्मक ज्ञानसे अभिन्न नहीं । फलतः उन धर्मों से रहित स्वतः सिद्ध ज्ञानमात्र के रहने में कोई अनुपपत्ति नहीं है । मानमेय खण्डन प्रकरणोक्त दोष पराधीनसिद्धिक वस्तुओंका ही निरास कर सकते हैं, स्वतः सिद्ध वस्तु के निरास में उनकी सामर्थ्य ही नहीं, यह भाव है । इसीलिए ज्ञानस्वरूप ब्रह्म सत्ता, गुणत्व, ज्ञानत्व आदि जड़धर्मों के सम्बन्ध से प्रवृत्त वाग्व्यवहार का अगोचर कहा गया है । प्रश्न—यदि ब्रह्म में कोई धर्म नहीं, तो ‘सत्यं ज्ञानमानन्दं ब्रह्म’ इस श्रुति में नित्यत्व धर्म का व्यवहार कैसे होता है ? उत्तर—काल के सम्बन्ध से वस्तु में अनित्यत्व का व्यवहार होता है और वह ब्रह्म में नहीं है । अतः अनित्यत्व के अभाव को मानकर उपचार ( आरोप से ) नित्यत्व-व्यवहार होता है । जैसे लाल, पीले आदि रूपों का अभाव के होने से आकाश में नीलरूपता का व्यवहार होता है ।

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