भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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३६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम ननु च स्वप्रकाशत्वं ज्ञानस्येत्यनुपपन्नमिदम्, क्रियाकर्मभावस्य भेदव्यति- रेकेणानुपपत्तेः । कार्या क्रिया हि कर्मणो भवति, कर्म च कारणं क्रियायाः । न च स्वेनैव स्वनिष्पादनं शक्यम्, पूर्वापरभावविशेषस्य हेतुहेतुमद्भावरूपत्वात् । न च तस्मादेव तदेव पूर्वमपरं च सम्भवति, तदनवच्छिन्नकालविशेषस्य तत्पूर्व- शब्दार्थत्वात् । तदा च तस्य सद्भावस्वीकारे स एव कालस्तदवच्छिन्नः, तदन- वच्छिन्नश्चेति विरोधात् । मैवम्; क्रियायाः कर्मजन्यतानियमानङ्गीकारात् । भवत्येव अनागतविषयविज्ञाने तदसम्भवात् । क्वचिज्जनकतामादाय च कर्मणि कारकत्वव्यपदेशात् । करण- व्यापारविषयत्वाद् वा परसमवेतक्रियाफलभागित्वाद्वा कर्मलक्षणात् विनापि क्रियाजनकत्वेन कर्मव्यवहारोपपत्तेः । किञ्च तत्कर्मत्वं यत्स्वं प्रति विरुद्धयते ? परसमवेतक्रियाफलभागित्वमिति प्रश्न—ज्ञान स्व-प्रकाश है, यह बात युक्त नहीं; क्योंकि क्रिया-कर्मभाव भेद के विना नहीं होता। क्रिया कर्म का कार्य है और कर्म क्रिया का कारण। स्व से स्व की उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि पूर्व-परभाव कार्य-कारणभावरूप है और अपने से आप पूर्व तथा पर नहीं हो सकता। अपने से अनवच्छिन्न (रहित) काल 'पूर्व' शब्द का अर्थ है। यदि पूर्वकाल में भी कार्य को मानें, तो वही काल उस कार्य से युक्त और अयुक्त है, ऐसा विरोध हो जायगा। उत्तर—'क्रिया कर्म से जन्य है'- यह नियम हम नहीं मानते; क्योंकि 'घटं ज्ञास्यति' इस भावी स्थल में व्यभिचार है। प्रश्न—यदि कर्म क्रिया का कारण नहीं, तो कर्म की कारक में गणना क्यों होती है ? उत्तर—'आत्मानं जानाति' आदि किसी- किसी स्थल में कर्म क्रिया का जनक होता है, अतएव कर्म की कारक में गणना की जाती है। प्रश्न—अतीत और अनागत कर्मों में भी रहनेवाले किसी एक शक्यताव- च्छेदक (कर्म-लक्षण) के न होने से अनुगत कर्म-व्यवहार कैसे होगा ? उत्तर— करण के व्यापार का जो विषय हो, उसे 'कर्म' कहते हैं। अथवा अन्य में रहनेवाली क्रिया के फल से युक्त को 'कर्म' कहते हैं। इन्हीं लक्षणों के अनुसार 'घटं ज्ञास्यति' आदि स्थल में क्रिया का जनक न होने पर भी घट में कर्मत्व का व्यवहार होता है। प्रश्न—वह कर्मत्व क्या है, जो स्व का स्व में विरुद्ध है ? निबंधकर्ता—अन्य में विद्यमान क्रिया-फल से युक्तत्व ही वह है। खंडनकर्ता—तब तो 'वृक्षात् पर्ण

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