खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] स्वप्रकाश-विज्ञानवाद-विचार ३६ नभ्युपगमात् तं प्रत्येतानल्लक्षणाऽसिद्धेः । तस्माद् व्याकरणकारैः शब्दसिद्धयर्थं नदीवृद्ध्यादिवत् कर्मापि परिभाषितमित्यलं तदनुगतलक्षणगवेषणया । करणव्यापारविषयः कर्म इति चेन्न । 'हस्तेन रामेण शरेण' इत्यादावति- प्रसङ्गात् । लक्षणं विनापि क्रियाजनकत्वे सति व्यापारोद्देश्यत्वेन कर्मव्यवहारोपपत्तेः। शेषञ्च ईश्वराभिसन्धौ स्वप्रकाशवादे १निर्वक्ष्यामः । ननु चाऽभेदे विषयविषयिभावस्यैवासङ्गतत्वम्, विषयित्वं हि विषयसम्बन्धिता, सम्बन्धश्च भेदमन्तरेणासम्भवदवस्थितिः, सम्बन्धमितेः सम्बन्धिस्वरूपभेदमिति व्यतिरेके वैपरीत्यावधारणात् । मैवम्; विषयविषयिभावसम्बन्धो हि न सम्बन्धिरूपाद्भिन्नः तथाभूतत्वेऽपि चान्ततः तत्सम्बन्धस्यापि स्वाश्रयात्मकत्वमभ्युपगम्यम्, अनवस्थाभयात् । तथा सति च सैव यथा सम्बन्धमितिः सम्बन्धस्वरूपात् सम्बन्धिनोर्भेदमानादायैव पर्यवस्यती- त्यभ्युपगन्तव्यं स्वभावसम्बन्धस्य इतरसम्बन्धमर्यादातिशायित्वात् । तथा विनाऽपि निर्वचन—करण के व्यापार का विषय कर्म है। खण्डन—‘हस्तेन रामेण शरेण बाली हतः' यहाँ हस्तरूप करण के व्यापार का विषय होने से शर कर्म हो जायगा । किञ्च, लक्षण के बिना भी ‘क्रियाजनकत्वे सति व्यापारोद्देश्यत्व'-रूप ( सब कर्मों में रहनेवाले ) अनुगत धर्मत्व से ही कर्म का व्यवहार हो जायगा । शेष ‘ईश्वराभिसन्धि’ ग्रन्थ के स्वप्रकाश-प्रकरण में कहेंगे । शङ्का—अभेद में विषय-विषयिभाव असङ्गत है, क्योंकि विषयित्व विषय की सम्बन्धिता है और सम्बन्ध की स्थिति सम्बन्धियों के भेद के बिना हो नहीं सकती । क्योंकि जहाँ-जहाँ सम्बन्धी के भेद की प्रमा है, वहीं सम्बन्ध की प्रमा होती है । स्व-प्रकाश-ज्ञानस्थल में सम्बन्धी के भेद की प्रमा नहीं है, अतः विषय-विषयि- भाव भी नहीं होगा । समाधान—विषय-विषयिभाव सम्बन्धी के स्वरूप से भिन्न नहीं है। यदि उसे सम्बन्धी के रूप से भिन्न मानें, तब भी अन्त में उसके सम्बन्ध को अवश्यमेव सम्बन्धीरूप मानना पड़ेगा। यदि उसे सम्बन्धीरूप न मानें, तो सम्बन्ध का सम्बन्ध, १ यहाँ भविष्यत्कालिक प्रयोगकर आगे 'अवोचाम च जल्पे' इत्यादि भूतकालिक प्रयोग किया गया है। इससे यह सन्देह होता है कि ग्रन्थकार ने प्रथम 'ईश्वराभिसन्धि' का निर्माणकर फिर 'खण्डन' का निर्माण किया, 'खण्डन' का निर्माणकर ईश्वराभिसन्धि' रची या दोनों का निर्माण एककाल में हुआ ? मेरे विचार में तो दोनों का निर्माण एक साथ ही हुआ है ।