भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 577

१परिच्छेद ] तर्क-विशेष-लक्षणों का खण्डन ५५५ अन्योन्याश्रयाभासत्वप्रयोजकस्य व्यक्तिभेदस्याभावो नानवस्थायाम्, एवमात्मा- श्रयाभासत्वप्रयोजकस्य द्वारभेदस्याभावो नाऽऽत्माश्रयान्तरादाविति व्यक्तम- व्यापकत्वापत्तेः । अपिच - अपसिद्धान्तविरोधादिष्वपि तर्कलक्षणं गच्छत्कथङ्कारं वारणीयम् ? यत्रैवं निग्रहे तर्कान्तराणामन्तर्भावः, तत्रैवानयोरपीति पृथक्निग्रहत्वानुपपत्तेः । तर्क-विशेषलक्षण-खण्डनम् आत्माश्रयादेश्च मूलव्याप्तौ प्रमाणोपगमश्चेत्तर्हि प्रामाणिकत्वान्न दोषत्वम्, न चेन्मूलशैथिल्यमित्युभयतः पाशबन्धः कथं मोचनीयः । अथोच्येत—यदेतदाश्रयत्वमाश्रयित्वं च तद्भेदे दृष्टं तद्यदि विवादाध्या- अभाव नहीं है। अतः अन्योन्याश्रय आदि में अव्याप्ति हो जायगी। इसी प्रकार एक आत्माश्रय के आभासत्वप्रयोजक द्वार-भेद का अभाव अन्य आत्माश्रय में नहीं है, अतः वहाँ भी अव्याप्ति हो जायगी। किंच - 'यदि संस्कारस्थिरत्वं स्वीकृतं बौद्धेन तदा अपसिद्धान्तः स्यात्' इस अपसिद्धान्त के आपादन में तथा 'यदि अस्थिरत्वं कथयित्वा स्थिरत्वं कथ्यते बौद्धेन तदा वचनविरोधः स्यात्' इस वचन-विरोध के आपादन में अतिव्याप्ति भी हो जायगी। यदि इनको तर्क मान लें, तो आत्माश्रयादि के तुल्य इनकी भी तर्क में ही गणना होनी चाहिए, पृथक् निग्रह-स्थानों के रूप में नहीं। यदि तर्क होने पर भी इनकी निग्रहस्थान में गणना करें, तो आत्माश्रयादि तर्कों की भी निग्रह में ही गणना होनी चाहिए। यदि आत्माश्रयादि का किसी निग्रहस्थान में अन्तर्भाव हो, तो उसी निग्रह- स्थान में अपसिद्धान्त आदि का भी अन्तर्भाव होना चाहिए, पृथक् गणना सर्वथा व्यर्थ है। तर्क-विशेष-लक्षणों का खण्डन किञ्च—आत्माश्रयादि तर्कों की मूल व्याप्ति में कोई प्रमाण है या नहीं ? यदि है, तो प्रामाणिक होने से आत्माश्रय को दोष ही न कहना चाहिए। यदि व्याप्ति में कोई प्रमाण नहीं, तो मूल के शैथिल्य से वह तर्क ही नहीं है—इस प्रकार उभयतः पाशबन्ध (दोतरफा दोष) से पिण्ड कैसे छुड़ायेंगे ? समर्थन—'यदि स्वस्य स्वापेक्षित्त्वं स्यात्तदा आत्माश्रयः स्यात्' इस प्रकार हम यहाँ आत्माश्रय का आपादन नहीं करते, जिससे उसके प्रामाणिकत्व-अप्रामाणिकत्व के विकल्प