खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] तर्क-विशेष-लक्षणों का खण्डन ५५७ न च वाच्यमापाद्यस्य प्रमाणबाध्यताऽनुकूलैवेति व्याघातादपि सा सम्भ- वन्ती न दोषमावहतीति ; यत आपाद्यापादकयोः सामानाधिकरण्यानादरेऽति- प्रसङ्गः स्यादतो विपर्ययापर्यवसायित्वमेवं स्यात् । एवं हि विपर्ययो वक्तव्यो यन्नाम ? भवति चैतदेतत्, तस्मान्नैतदाश्रय इति । न चैतदेतद् भवितुं शक्नोति, एतदित्युद्दिष्टे धर्मिण्येतत्त्वविधानासम्भवात्, उद्देश्यविधेययोः प्रकारभेदस्याभावात् । न च प्रसङ्गमात्रमेतद्भाधायैवास्तु, कृतमस्य विपर्ययपर्यवसानेनेति युक्तम् । समर्थन—आत्माश्रय आदि तर्क परपक्ष-दूषण के लिए ही हैं, उनमें आपाद्य के व्याघात आदि से जायमान प्रमाणबाध्यता आदि दोष नहीं, गुण ही हैं। खण्डन—एत- दाश्रयत्व और एतदाश्रितत्व तो आपादक हैं और अनेकत्व आपाद्य । इन दोनों के सामानाधिकरण्य का यदि अनादर करें, तो एकत्व से अभिमत वस्तुमात्र में एकत्व का भङ्ग हो जायगा । कारण अन्यत्र स्थित उक्त आपादक से सर्वत्र भेद का आपादन हो सकेगा । इसके लिए यदि सामानाधिकरण्य का आदर करें, तो विपर्यय में पर्यव- सान नहीं होगा, जिससे वह तर्काभास हो जायगा । कारण विपर्यय में पर्यवसान इसी प्रकार करेंगे कि ‘एतद्घटः एतद्घटो भवति, तस्मान्न एतद्घटाश्रयः ।’ किन्तु यह संभव नहीं। कारण एतद्-धर्मी में एतत्त्व का विधान¹ नहीं हो सकता, क्योंकि सर्वत्र उद्देश्य-विधेय के सामानाधिकरण्य के लिए उनमें प्रकारभेद का नियम है और यहाँ प्रकारभेद है नहीं । समर्थन—आत्माश्रय आदि केवल परपक्ष के बाधन के लिए ही हैं। अतः इनमें विपर्यय-पर्यवसान व्यर्थ है । स्वपक्षसाधनार्थ प्रयुक्त प्रसंग में ही विपर्यय- पर्यवसायित्व अपेक्षित हुआ करता है। खण्डन—आत्माश्रयादि प्रसङ्गों के मूल में आपको भी व्याप्ति माननी ही होगी। अन्यथा ¹मूलशैथिल्य होने से वह तर्काभास हो जायगा । एवञ्च आपादित (प्रसंजित) अनेकत्व के निषेध (एकत्व) में तद्व्यतिरेक (व्यतिरेकव्याप्ति) को प्रामाणिक अवश्य मानना चाहिए । कारण अन्वय-व्याप्ति १. यदि कहें कि ‘पर-पक्षबाधनस्थल में पर द्वारा स्वीकृत ही व्याप्ति को लेकर काम चला लेंगे; तो मूलशैथिल्य कहाँ होगा ?’ तो वह भी ठीक नहीं। उसका (प्रसंग का) कभी स्वपक्षसाधनत्वेन भी उपयोग किया ही जाता है। उस समय उसमें व्याप्ति न मानें, तो मूलशैथिल्य स्पष्ट ही है । किञ्च—स्वयं व्याप्ति न मानें, तो अन्यतर द्वारा असिद्ध आपादक भी आभास का ही प्रयोजक हो जायगा ।