भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] शून्यवाद् और स्वप्रकाश-विज्ञानवाद का भेद ४३ विज्ञानव्यतिरिक्तं पुनरिदं विश्वं सदसद्भ्यां विलक्षणं ब्रह्मवादिनः संगिरन्ते । तथाहि—नेदं सत् भवितुमर्हति, वक्ष्यमाणदूषणग्रस्तत्वात् । नाप्यसदेव, तथा सति लौकिकविचारकाणां सर्वव्यवहारव्याहत्यापत्तेः । यदपि 'निर्वक्तुमसामर्थ्ये गुरव उपास्यन्ताम्, येभ्यो निरुक्तयः शिष्यन्ते' इत्युपालम्भवचनं; तत्तदा शोभेत, यदि मेयस्वभावानुगामिनीयम- निर्वचनीयतेति न ब्रूयुः, वक्तृदोषादिति च वदेयुः । यस्तु वादी निरुक्त्यभिमानं धत्ते, स निर्वक्तुं न तु शक्ष्यति वक्तव्यदोषात् । न च ते दोषाः स्वकमपि घ्नन्तः जातयः कथं न स्युरिति वाच्यम्; यतो निर्वचनीयत्वं बाध्यते तैर्दोषैः स्वयमप्यनिर्वचनीयैरेव । अनिर्वचनीयैरव च तैर्व्यवह्रियत एवेति कुतोऽस्मान् प्रति व्याघातः स्यात् । तज्जातित्वस्य च निरूप्य योजयितुमशक्यत्वात् । 'विज्ञान से भिन्न सब वस्तुएँ सत्-असत् से विलक्षण हैं', यह ब्रह्मवादी कहते हैं । देखिये—यह प्रपञ्च सत् नहीं है, क्योंकि वस्तु की सिद्धि लक्षण से होती है और लक्षण वक्ष्यमाण दूषणों से दूषित है । वह असत् भी नहीं है, क्योंकि लौकिक तथा परीक्षक के व्यवहार का विषय होता है । प्रश्न—यदि निरुक्ति ( लक्षण ) नहीं कर सकते, तो उन गुरुओं की सेवा कीजिये, जिनसे निरुक्ति की शिक्षा मिलती है । उत्तर—यह निन्दागर्भित प्रश्न तब शोभा देता, यदि आप मेय के स्वभाव को ही अनिर्वचनीय न कहकर 'वक्ता के दोष से अनिर्वचनीय है' ऐसा कहते । जो वादी निरुक्ति ( लक्षण ) करने का अभिमान करते हैं, वे भी वक्तव्य ( मेय ) के दोष से निरुक्ति नहीं कर सकते । प्रश्न—अव्याप्ति, अतिव्याप्ति आदि जैसे प्रमाण, प्रमेय आदि के लक्षणों को दूषित करते हैं, वैसे ही अपने लक्षणों को भी दूषित करते हैं । अतः प्रमाण आदि के लक्षणों का खण्डन जाति-उत्तर है । स्वव्याघातक ( अपने स्वरूप को नष्ट करनेवाले ) असत् उत्तर को 'जाति' कहते हैं । उत्तर—अव्याप्ति आदि भी स्व-लक्षण में अव्याप्ति आदि दोष होने से सत्-असत् से विलक्षण अनिर्वचनीय अवश्य हैं । किन्तु अनिर्वचनीय दोषों से ही लक्षणों के खण्डन द्वारा जगत् की अनिर्वचनीयता बोधित होती है । आप तो अनिर्वचनीय अव्याप्त्यादि दोषों से भी व्यवहार करते ही हैं । फिर मेरे कथन में व्याघात कैसे हो सकता है ? किञ्च, आप जाति की निरुक्ति ( लक्षण ) भी नहीं