भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 67

५२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम यदा चैवं तदा बाधिकायाः प्रत्यक्षधियो बाध्यायाश्चाऽद्वैतबोधने श्रुतिनिरा- बाधा सती तयोरैक्यं बोधयतीति तत्प्रत्यक्षादि कथं स्वात्मानमेव बाधेत । घटेन पटेन तद्भेदेन च स्वविषयेण सह तस्या एव धियः श्रुत्या सर्वस्याद्वैतं गोचर- यन्त्या कथं नामेदे प्रामाण्यमासादितव्यम्, तत्राबाध्यमानत्वात् । र्नाह तस्या धियः स्वात्मा वा स्वात्मना सह घटपटादेर्भेर्दोऽपि वा विषयः । 'घटपटौ भिन्नौ' इत्येवमाकारा हि सा जायते, न तु 'अहं घटात् पटाच्च भिन्ना, मत्तो वा तौ भिन्नौ' इति । स्वप्रकाशताऽपि स्वमात्रे साक्षिणी, न तु यतो यतः प्रकाशो भिद्यते ततस्तत- स्तस्य भेदेऽपि । अन्यथा तत्तदपि स्वप्रकाशकुक्षौ निक्षिपन्ती न कथमद्वैते एव पर्यवस्यति । सर्वा भूतानि' इस श्रुति का अग्नीषोमीय पशुमात्र विषय में बाध करती है, अन्य पशु- विषय में नहीं। यदि अन्यत्र भी बाध करे, तो 'मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि' इस श्रुति का वैयर्थ्य हो जायगा । यदि ऐसा है, तो बाधक प्रत्यक्ष-बुद्धि और बाध्य अद्वैत-बुद्धि दोनों के अद्वैत- बोधन में बाध-रहित अद्वैत-श्रुति उन दोनों के अभेद का बोध करायेगी । अतः वह प्रत्यक्ष-बुद्धि अपने आपका बाध कैसे कर सकती है ? परस्पर सारे जगत् के अभेद को विषय करनेवाली श्रुति 'घटः पटाद् भिन्नः' इस प्रत्यक्ष-बुद्धि के स्व-विषय घट- पट और भेद के साथ अभेद-बोधन में प्रामाण्य क्यों न प्राप्त करे; क्योंकि उस विषय में कोई बाधक नहीं है । उस बुद्धि के विषय अपनी आत्मा ( स्वरूप ) या अपनी आत्मा के साथ घट-पट के भेद नहीं है; क्योंकि प्रत्यक्ष-बुद्धि 'घटपटौ भिन्नौ' इत्याकारक ही होती है, 'अहं घटात् पटाच्च भिन्ना' अथवा 'मत्तो वा तौ भिन्नौ' इत्याकारक नहीं होती । समर्थन—बुद्धि स्वप्रकाश है, अतएव स्व और स्व के भेद का व्यवहार करायेगी। खंडन--स्वप्रकाश होने से बुद्धि अपना तो व्यवहार अवश्य करायेगी, परन्तु जिस- जिससे वह भिन्न है, उस-उससे अपने में रहनेवाले भेद का व्यवहार नहीं करायेगी; क्योंकि भेद का स्वभाव है कि वह प्रतियोगी और धर्मी से व्यतिरिक्त ज्ञान का गोचर होता है । यदि ज्ञान का गोचर न होकर भी भेद को सिद्ध मानें, तो भेद भी ज्ञानस्वरूप हो जायगा, क्योंकि संविद्-विषय के न होने पर भी सिद्धत्व संविद् का ही स्वभाव है ।