भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 87

७२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम न च वाच्यं 'घटे पटत्वं नास्ति, पटे च घटत्वं नास्ती'त्येतावन्मात्रपर्यव- सितैव अन्योन्याभावस्य व्यवस्था मन्तव्येति । यतस्तथा सति घटत्वे पटत्वे च न कश्चित्तादृशो धर्मोऽभ्युपगम्यते, योऽन्योन्यस्मिन्निषेद्धुं योग्य इति तयोस्तादात्म्या- पत्तौ सत्यां घटे पटत्वं पटे घटत्वं च निषेधत् प्रमाणं घटत्वपटत्वशून्यत्व द्वयमप्या- वेदयतीति वैधर्म्यस्य स्वरूपभेदस्य चासंभवेन किं 'प्रतियोगिनं किं वाऽऽलम्बनं विधाय पटघटान्योन्याभावः प्रमाणपथमवतरेदिति । अत एव न वैधर्म्यमपि भेदमावेदयत् प्रत्यक्षमद्वैतश्रुतिबाधकमुपपद्यते । वैधर्म्येऽपि हि घटत्वपटत्वादौ वैधर्म्यमन्यदस्तीत्यभ्युपगमे वैधर्म्ये वैधर्म्याविश्रा- न्त्यनवस्थयोरेकमनुंभवश्च कथं प्रत्युत्तरणीयः । वैधर्म्ये च वैधर्म्यास्वीकारे वैधर्म्ययोरेक्यापत्त्या कथमात्माश्रयभेदत्वेन तयोः पर्यवसानं स्यात् । समर्थन—यदि कहें कि घट में पटत्व का तथा पट में घटत्व का अभाव ही घट- पट का अन्योन्याभाव है ? खंडन—ऐसा होने पर घटत्व तथा पटत्व में ऐसा कोई धर्म नहीं, जिसका अभाव पटत्व-घटत्व में माना जाय । अतः उन दोनों में तादात्म्य होने पर घट में पटत्व तथा पट में घटत्व के अभाव को विषय करनेवाला प्रमाण घटत्व तथा पटत्व से शून्य दोनों को सिद्ध करेगा । इसलिए घट तथा पट में वैधर्म्य तथा स्वरूपभेद के न होने से अन्योन्याभाव किसे प्रतियोगी या आलम्बन मानकर प्रमाण का विषय होगा ? समर्थन--घटनिष्ठ अभाव-प्रतियोगी पटत्वरूप धर्मवत्त्वरूप पट का तथा पटनिष्ठ अभाव-प्रतियोगी घटत्वरूप धर्मवत्त्व घट का जो वैधर्म्य है, वही भेद है । उसीका अवलम्बनकर भेद-प्रत्यक्ष श्रुति का बाधक हो सकता है ? खण्डन—वैधर्म्य में वैधर्म्य रहता है या नहीं ? यदि नहीं, तो वैधर्म्य की विश्रान्ति ही दोष हुआ । फिर जिस वैधर्म्य में वैधर्म्यान्तर नहीं मानेंगे, तो उन दोनों का ऐक्य भी हो जायगा । यदि वैधर्म्यों की अनादि-अनन्त धारा मानें, तो अनवस्था दोष होगा । यदि बीजाङ्कुर के तुल्य अनवस्था को इष्टापत्ति मानें तो वैधम्य में वैधर्म्य, उसमें अन्य वैधर्म्य—इस रीति से वैधर्म्य की अविश्रान्त धारा अनुभव की अविषय होने से अननुभवरूप दोष हो जायगा । यदि कहें कि वैधर्म्य में वैधर्म्य नहीं रहता, तो उन दोनों में ऐक्य होने से वे अपने अधिकरण के भेद कैसे कहलायेंगे ? १. 'कं प्रतियोगिनम्, किं प्रतियोगि वा' इति साधु पाठः ।