खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
खण्डन-खण्ड-खाद्य में उद्धृत वचनों का अनुक्रम
| वचन | ग्रन्थ | ग्रन्थकार | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| १. अत्यन्तासत्यपि ह्यर्थे | श्लोकवा० (सू० २ का० ६) | श्रीकुमारिलं | ६०, ४२४ |
| २. अधःशब्दनिगद्यं किम् | पराशरस्मृति | श्रीपराशर | ४५४ |
| ३. ऋये परप्रयुक्तानाम् | श्लोकवा० (सू० ५, का० १४-२५) | श्रीकुमारिल | २७४ |
| ४. अप्रत्यक्षोपलम्भस्य | प्रमाणवार्तिक | श्रीधर्मकीर्ति | ३१ |
| ५. अयमेव हि भेदो भेदहेतुर्वा | प्रमाणवार्तिकाळङ्कार | श्रीप्रज्ञाकर गुप्त | ५३६ |
| ६. एकमेवाद्वितीयम् | छान्दोग्य-उप० (६।२।१) | × | ४६ |
| ७. एकसाध्याविनाभावो | श्लोकवा० (बृहट्टीका) | श्रीकुमारिल | २७४ |
| ८. एवं त्रिचतुरजन्मनों | श्लोकवा० (सू०२, का० ६१) | " | १५. |
| ६. तस्माद्बोधात्मकत्वेन | श्लोकवा० (सू०२, का० ५३) | " | ५६८ |
| १०. दुःखजन्मप्रवृत्तिदोष० | न्यायसूत्र (१।१।२) | श्रीगौतम | ५६३ |
| ११. द्वितीयाद्वै भयं भवति | बृहदा० (१।४।२) | × | ७६ |
| १२. नहि शास्त्राश्रया वादा | प्रमाणवार्तिक | श्रीधर्मकीर्ति | ४०७ |
| १३. निश्चितौ हि वादं कुरुतः | तात्पर्यटीका | श्रीवाचस्पति | ३६५ |
| १४. नेह नानाऽस्ति किञ्चन | बृहदा० (६।१।२१) | × | ४६ |
| १५. नैषा तर्केण मतिरापनेया | कठोप० (२।६) | × | ८१ |
| १६. परस्परविरोधे हि | कुसुमाञ्जलि (३।८) | श्रीउदयनाचार्य | ४४,४२० |
| १७. प्रमाणवन्त्यदृष्टानि | तन्त्रवार्तिकं (२।१।५) | श्रीकुमारिल | ४१ |
| १८. प्रमाणमविसंवादि | प्रमाणवार्तिक (१।३) | श्रीधर्मकीर्ति | १६४ |
| १६. प्रत्यक्षावगतेऽपि दहने | तत्त्वोपप्लवसिंह | श्रीजयराशिभट्ट | २२४ |
| २०. प्रमेया च तुलाप्रामाण्यवन् | न्यायसूत्र (२।१।१६) | श्रीगौतम | ३६६ |
| २१. प्राग्दिशो विभक्तिः | अष्टाध्यायी (५।३।१) | श्रीपाणिनि | ३०० |
| २२. मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च | न्यायसूत्र (२।१।१२) | श्रीगौतम | १७५ |
| २३. बुद्ध्या विवेचितानां तु | लङ्कावतारसूत्र (सगाथक, १६७) | श्रीबुद्धदेव | ४२ |
| २४. (अत्र ब्रूमो) य एवार्थो | प्रकरण-पञ्चिका (३) | श्रीशालिकनाथ | ४६५ |
| २५. यत्रानुकूलतर्को नास्ति | कुसुमाञ्जलि (६।७) | श्रीउदयन | ३२७ |
( २ ) २६. यत्रोभयोः समो दोषः तन्त्रवार्तिक (शून्यवाद) श्रीकुमारिल ३६३,५४४ २७. रिक्तस्य जन्तोर्जातस्य × सौगत ४०७ २८. लक्षणस्याभिधानं तु श्लोकवा० (४।२) श्रीकुमारिल २४८ २६. लब्धरूपं क्वचित्किञ्चित् ब्रह्मसिद्धि (तर्क० २) श्रीमण्डन मिश्र ५३६ ३०. वर्णा (ते) विभक्त्यन्ताः न्यायसूत्र (२।२।५६) श्रीगौतम ३०० ३१. वस्तुनः प्रतियोगिता कुसुमाञ्जलि (३।२) श्रीउदयन ५३६ ३२. विभक्तिश्च अष्टाध्यायी (१।४।१०४) श्रीपाणिनि ३०० ३३. विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य सुभाषित × ५७६ ३४. सप्रयोजनमनुयुक्तो न्यायभाष्य श्रीवात्स्यायन ७ ३५. सम्बद्धं वर्तमानं च श्लोकवा० (४।८४) श्रीकुमारिल २३० ३६. समानमित्यनुत्तर० न्यायवार्तिक (२।१।१६) श्रीउद्योतकर ३६७ ३७. सुप्तिङन्तं पदम् अष्टाध्यायी (१।४।१४) श्रीपाणिनि ३०० ३८. स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य गीता (२।४४) श्रीवेदव्यास ८१