भारतकोश
किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi

महाकवि भारवि द्वारा

स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)

DevanagariHindipublished707 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 707 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 30

( 8 )

सहदेव कठिन भूमि में सोते हैं। इन सबों को इस दशा में देखकर भी आपको दुःख नहीं होता। यह देखकर मुझे अत्यन्त दुःख हो रहा है।

हे महाराज! आप अब शान्ति को छोड़कर शत्रुओं को नष्ट करने के लिए अपना पुराना तेज धारण कीजिए, क्योंकि शान्ति से मुनियों का कार्य होता है न कि राजाओं का। सब प्रकार से समर्थ होते हुए भी शत्रु विजय के लिए आपका समय की प्रतीक्षा करते रहना उचित नहीं है क्योंकि विजय चाहने वाले राजा लोग समय पड़ने पर किसी न किसी व्याज से सन्धि को भी तोड़ देते हैं।

द्वितीय सर्ग

युधिष्ठिर के प्रति भीम की उक्ति

इस प्रकार द्रौपदी की अपने मनोनुकूल बातें सुनकर भीम युधिष्ठिर से बोले हे महाराज ! द्रौपदी ने इस समय जो कहा वह उचित कहा, स्त्री की कही हुई समझ कर आपको इसकी उपेक्षा करना उचित नहीं है। यदि अवधि की प्रतीक्षा करते रहियेगा तो निश्चय समझिये कि दुर्योधन इतने दिन तक राज्यसुख भोगकर आपको अवधि बीतने पर राज्य दे देगा यह असम्भव है। अतः आलस्य छोड़कर पुरुषार्थ कीजिए।

इस भाँति अत्यन्त क्रुद्ध भीमसेन की बातें सुनकर मतवाले हाथी की भाँति उन्हें धीरे-धीरे शान्त करने के लिए महाराज युधिष्ठिर चेष्टा करते हुए बोले—

भीम के प्रति युधिष्ठिर की उक्ति

हे भीम ! तुमने जो कुछ कहा, वह ठीक है, तथापि मेरा मन विचारपूर्वक कार्य करने को कहता है क्योंकि असमय में क्रोध करना अत्यन्त अनुचित है। यदि इस समय नियम तोड़कर चढ़ाई न की जाय तो जितने राजा हैं वे सब अवधि के बाद हमारी सहायता करेंगे। अहङ्कारी मनुष्य की सेवा में जो लोग रहते हैं वे लोग जब समय पड़ता है तब उसे छोड़ देते हैं, क्योंकि उसके दुर्व्यवहार से मन में सभी अप्रसन्न रहते हैं। अतः अब तक अवधि है तब तक शान्ति के साथ समय बिताना उचित है। इस प्रकार से जब युधिष्ठिर भीम को समझा रहे थे, ठीक उसी समय दैवात् व्यास जी पहुँच गये। उन्हें देखते ही सबने उठकर स्वागत किया तथा आदर से लाकर उच्च आसन पर बैठाया। पश्चात् स्वयं भी आज्ञा पाकर हाथ जोड़कर सम्मुख बैठ गये।