किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
पृष्ठ 586, कुल 707 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३३० | किरातार्जुनीयम् |
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प्लुतगतौ' इति धातोः शतृप्रत्ययः। सोऽर्जुनो लीलां शोभां ललौ प्राप। 'ला आदाने' कर्तरि लिट् ॥ ५ ॥
**हिन्दी—**साऽसिः = असि (तलवार) को लिये हुए, साऽसुसूः = असु (प्राण)-को प्रेरणा करनेवाले अर्थात् बाण उसको लिये हुए, साऽसः = आस = बाणोंको छोड़नेवाला धनु, उससे युक्त, येयायेयायनायायथः = अर्थात् येयाः (यानसे साध्य) अयेयाः (यानके बिना साध्य), येयाऽयेयानम् (यान साध्य और अयानसाध्य) इनके आये (सुवर्ण और गज आदिके लाभमे) याति (जो प्राप्त होता है), अयम् (शुभकारक भाग्य) को जो याति (प्राप्त करता है), इस कारणसे ललः (शोभित होनेवाला), अलोलः (जो लोल अर्थात् चपल नहीं है) शशीशः = शशी (चन्द्रमा) उनके ईश (स्वामी) अर्थात् शिवजी, उनके शिशु (बालक अर्थात् स्कन्द), उनका ताडनकरनेवाले शशन् = प्लुतगति करते हुए सः = अर्जुन लीलां (शोभा) को ललौ = प्राप्त हुए ॥ ५ ॥
**हिन्दी—**हाथमें तलवार, बाण और धनुषको लिये हुए और यानसाध्य और अयानसाध्य दोनों प्रकारके सुवर्ण और हाथी आदिके लाभमें प्राप्त होनेवाले शुभदायक भाग्यको प्राप्त करनेवाले शोभायुक्त चञ्चल न होकर शिवपुत्र स्कन्दको पीडित करते हुए प्लुत गतिवाले होकर अर्जुन शोभित हुए ॥ ५ ॥
यह "एकाक्षर पद्य" नामका चित्रकाव्य है।
त्रासजिह्मं यतश्चैतान् मन्दमेवान्वियाय सः।
नातिपीडयितुं भग्नानिच्छन्ति हि महौजसः॥ ६ ॥
**मल्लि०—**त्रासेति। सोऽर्जुनः। त्रासजिह्मं भयविलम्बं यथा तथा यतो गच्छतः। पलायमानानित्यर्थः। एतान् गणान् मन्दमेव। अन्वियायानुजगाम। तथा हि—महौजसो महानुभावा भग्नानतिपीडयितुं नेच्छन्ति ॥ ६ ॥
**हिन्दी—**अर्जुनने भयसे कुटिल होकर जाते हुए (भागते हुए) इन गणों का मन्दगतिसे अनुगमन किया, क्योंकि महानुभावलोग भागे हुएको ज्यादा पीडित करना नहीं चाहते हैं ॥ ६ ॥
अथाग्रे हसता साचिस्थितेन स्थिरकीर्तिना।
सेनान्या ते जगदिरे किञ्चिदायस्तचेतसा॥ ७ ॥
(निरोष्ठ्यम्)