भारतकोश
किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi

महाकवि भारवि द्वारा

स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)

DevanagariHindipublished707 पृष्ठ

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अष्टादशः सर्गः | ४२३

मल्लि०—व्रजेति । शिवेन व्रज स्वपुरं गच्छ, रिपुलोकं जयेति गदित उक्तः । यतः पादपद्मानतः शिवपादपङ्कजानतः सन्, तथा देवसंघैः श्लाघितः स्तुतोऽत एव धृता गुर्वी जयलक्ष्मीर्येन स पाण्डुपुत्रोऽर्जुनो निजगृहं स्वाश्रमं गत्वा प्राप्य, अथ सादरं यथा तथा धर्मसूनुं युधिष्ठिरं ननाम नमश्चक्रे ॥ ४८ ॥

इति मल्लिनाथकृतव्याख्यायां घण्टापथसमाख्यायामष्टादशः सर्गः समाप्तः ।

हिन्दी—शिवजीसे—'जाओ और शत्रुसमूहको जीत लो' ऐसा कहे गये तथा शिवजीके चरणकमलोंमें प्रणाम करते हुए और देवसमूहसे स्तुतिके विषय होकर एवम् महती जयलक्ष्मीका धारण किये हुए अर्जुनने अपने आश्रममें पहुँचकर धर्म-पुत्र युधिष्ठिरको आदरपूर्वक प्रणाम किया ॥ ४८ ॥

किरातार्जुनीय महाकाव्यमें अठारहवें सर्गका अनुवाद समाप्त हुआ ।

नमो भगवते सूर्यनारायणाय नमो नमः ।