किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
DevanagariHindipublished707 पृष्ठ
पृष्ठ 703, कुल 707 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 703
श्लोकानुक्रमणिका
४४५
| श्लोक | स० | श्लो० | श्लोक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| शक्तिवैकल्यनम्रस्य | ११ | ५९ | श्रद्धेया विप्रलम्भारः | ११ | ६५ |
| शङ्किताय कृतबाष्प | ९ | ४६ | श्रियः कुरुणामधिपस्य | १ | १ |
| शतशो विशिखानवयते | १५ | ४८ | श्रियं विकल्पत्यपहस्त्य | ३ | ७ |
| शमयन्घृतेन्द्रियशमैक | ६ | २० | श्रिया हसद्भिः कमलानि | ८ | ४४ |
| शरणं भवन्तमति | १८ | २२ | श्रीमद्भिनियमितकन्धरा | ७ | ३७ |
| शरदम्बुधरच्छाया | ११ | १२ | श्रीमद्भिः प्ररयगजैः | ७ | १ |
| शरवृष्टि विषूयोर्वी | १५ | ४१ | श्रीमल्लताभवनमोषधयः | ५ | २८ |
| शरानवद्यन्ननवद्य | १७ | ५६ | श्रुतमप्यधिगम्य | २ | ४१ |
| शशधर इव लोचनाभि | १० | ११ | श्रुतिसुखमुपवीणितं | १० | ३८ |
| शाम्भोर्धनुर्मण्डलतः | १५ | ४९ | श्रेयसों तव सम्प्राप्ता | ११ | ११ |
| शाखावसक्तकमनीय | ७ | ४० | श्रेयसोऽप्यस्य ते तात | ११ | ४४ |
| शान्तता विनययोगि | १३ | ३७ | श्लिष्यतः प्रियवधूरूप | ९ | ६७ |
| शारतां गमितया शशि | ९ | २९ | श्वसनचलितपल्लवा | १० | ३४ |
| शिरसा हरिमणिप्रभः | ६ | २३ | श्वस्त्वया मुखसंवित्तिः | १० | ३४ |
| शिलाघनेनीकसदा | ८ | ३२ | स | ||
| शिवध्वजिन्यः प्रतियोध | १४ | ५८ | स किंसखा साधु न | १ | ५ |
| शिवप्रणुन्नेन शिली | १७ | ५८ | सक्ति जवानपनयत्य | ५ | ४६ |
| शिवभुजाहूतिभिन्न | १८ | ३ | स क्षत्रियस्त्राणसहः | ३ | ४८ |
| शिवमौपयिकं गरी | २ | ३५ | स खण्डनं प्राप्य पराद | १७ | ६० |
| शीधुपानविधुरासु | ९ | ४२ | सखा स युक्ताः कथितः | १४ | २१ |
| शीधुपानविधुरेष | ९ | ७३ | सखि दयितमिहानयेति | १० | ४७ |
| शुष्वितेर्मूलनिचयै | ५ | ४२ | सखीजनं प्रेम गुरुकृता | ८ | ११ |
| शुचि भूषयति श्रुतं | २ | ३२ | सखीनिव प्रीतियुजो | १ | १० |
| शुचिरप्सु विद्रुमलता | ६ | १३ | स गतः क्षितिमूष्ण | १३ | ३१ |
| शुचिवल्कवीततनुरम्य | ६ | ६१ | सचकितमिव विस्मया | १० | ७ |
| शुभाननाः साम्बुरुहेषु | ८ | ४२ | स जगाम विस्मयमुदीक्ष्य | ६ | १५ |
| शून्यामाकीर्णतामेति | ११ | २७ | सजलजलधरं नभो | १० | १९ |
| श्योतन्मयूखेऽपि हिम | ३ | ८ | सजनोऽसि विजहीहि | १३ | ६६ |