कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंछठा उल्लास पूजा-रहस्य और द्रव्य-संस्कार देवी बोली—हे कुलेश ! मैं पूजन का लक्षण सुनना चाहती हूँ। हे शिव ! मुझे कुलद्रव्यादि का संस्कार और अर्चन बताओ। ईश्वर ने कहा—हे देवि ! सुनो, जो तुमने पूछा है, उसे मैं कहूँगा। पूर्णाभिषेक से युक्त साधक गुरुभक्तिपूर्वक आत्म- निष्ठ होकर मन्त्रयोग से श्रीचक्रार्चन करे। 'मैं भैरव हूँ'—इस प्रकार की अनुभूति के साथ साधक कुलपूजा करे। एकान्त स्थान में, किसी वन-प्रदेश में या बाधारहित स्थान में सूक्ष्मा- सन पर पूर्व या उत्तर मुख बैठकर अमृतसागर में स्थित मणि- द्वीप में कल्पवृक्ष के नीचे वज्रप्राकार से सुरक्षित माणिक्य- मण्डप का ध्यान करे, जो पुष्पमालाओं के वितान से सुशो- भित है और कर्पूरदीप से प्रकाशमान तथा धूपादि से सुगन्धित है। उस मण्डप को सुधास्वरूप ध्यानकर कुलपूजा करे। पहले आत्म, स्थान, मनु (मन्त्र), द्रव्य और देव इन पञ्च- शुद्धियों को कर ले। सुन्दर स्नान, भूतशुद्धि, प्राणायाम, षडङ्गादि समस्त- न्यासों से आत्मशुद्धि होती है। पूजास्थल को सम्मार्जन, अनु- लेपन आदि के द्वारा दर्पणवत् स्वच्छ करना, वितान-धूप-दीप- पुष्पमाला, पञ्चरङ्गों से सजाना ही स्थानशुद्धि कही गई है। मूलमन्त्रों के अक्षरों को मातृकावर्णों से ग्रथित कर क्रमपूर्वक द्विरावृत्ति करने से मन्त्रशुद्धि होती है। पूजा-द्रव्य और आसन का मूलमन्त्र से प्रोक्षण कर धेनुमुद्रा दिखावे—यह द्रव्यशुद्धि है। पीठ में देवता की प्राणप्रतिष्ठा कर उसके विग्रह का