कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४ हिन्दी कुलार्णव सर्वभूतों को बलि देकर यह प्रार्थना करे—'भूता ये विविधा- कारा दिक्षु भौमान्तरीक्षगाः। पातालसंस्था ये केचिच्छ्लवे ! ये च न भाविताः ॥ ब्रह्माद्याः सत्यसन्धाश्च भृत्याः शक्त्युप- वृंहिताः। तृप्यन्तु प्रीतमनसः प्रतिगृह्णन्त्विमं बलिं ।' 'ॐ ॐ ॐ देवी-पुत्र सर्वविघ्नान्नाशय नाशय सर्वोपचार- सहितामिमां पूजां बलिं गृह गृह स्वाहा, अयं भैरवाधिष्ठिताय अक्षोभ्यवन्दितः हृदयाधिष्ठितं सिद्धार्थं अवतर अवतर क्षेत्रपाल क्षेत्रपाल महाक्षेत्र ग्रामाधिपतेऽदेशाधिपते वटुकनाथ देवीपुत्र मेघनाद प्रचण्डोग्र कपाली भीषण सर्वविघ्नाधिपते इमां पूजां बलिं गृह गृह कुरु कुरु मम दूरय दूरय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल सर्वविघ्नान् नाशय नाशय क्षां क्षीं क्षूं क्षैं क्षौं क्षं मातृपुत्र कुलपुत्र क्षेत्रपालाय वौषट् हुं । ॐ ॐ ॐ अमुक क्षेत्रपाल राजराजेश्वर इमां पूजा बलिं गृह गृह स्वाहा' से क्षेत्रपाल को बलि देकर यह प्रार्थना करे—'अनेन बलिदानेन बटुबद्ध-समन्वितः राजराजेश्वरो देवो मे प्रसीदतु सर्वदा ।' वटुक को पश्चिम में, योगिनी को उत्तर में, सर्वभूत को पूर्व में और क्षेत्रपाल को दक्षिण में बलि प्रदान कर मध्य में राजराजेश्वर की पूजा करे। अंगुष्ठ-अनामिका से बटुक को, तर्जनी-मध्यमा-अनामा-अंगुष्ठ से योगिनी को, सभी अँगुलियां से सर्वभूत को, अंगुष्ठ-तर्जनी से क्षेत्रपाल को और अंगुष्ठ- मध्यमा से राजराजेश्वर को बलि दे । इस प्रकार वटुकादि की पूजा कर कुलदीपों की पूजा करे । चार अंगुल बड़े डमरु के आकार के तीन कोनेवाले दीपक आटे से बनावे । दीपक ऐसे हों कि उनमें एक कर्ष घी आ