कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४६ हिन्दी कुलार्णव दुःखों से निवृत्त, सन्तुष्ट, निर्द्वन्द्व और मत्सरहीन होकर जो कुलज्ञान में तन्मय, शान्त और सक्त होते हैं, वे कौलिक हैं। मद, क्रोध, दम्भ, आशा, अहङ्कार से हीन सत्यवादी कौलि- केन्द्र जितेन्द्रिय होते हैं। कुल की प्रशंसा होने पर वे रोमांचित हो उठते हैं, उनका स्वर गद्गद् हो जाता है। संसार में शिवोक्त कुलधर्म सब धर्मों से श्रेष्ठ है, ऐसे निश्चय से युक्त बुद्धिवाले उत्तम कौलिक कहे जाते हैं। हे देवि ! शुभ दिन पर कौलिकों को देवता समझ कर सहर्ष उन्हें निमन्त्रण दे और गन्धपुष्पाक्षत आदि से उनकी पूजा कर पञ्चमकार एवं मुद्राओं से सभक्ति उनको सन्तुष्ट करे। उनके सन्तुष्ट होने से मैं प्रसन्न होता हूँ और समस्त देवता प्रसन्न होते हैं। ज्ञानी हो; चाहे अज्ञानी—यदि किसी भी प्रकार की मुक्ति चाहिए तो जब तक शरीर की स्थिति है, तब तक अपने-अपने वर्ण और आश्रम के आचार का पालन अवश्य करना चाहिए। कर्म के द्वारा अज्ञान का उन्मूलन होने पर ज्ञान के द्वारा 'शिवत्व' की प्राप्ति होती है। शिव से ऐक्य स्थापित करने वाले की ही मुक्ति होती है। अतः कर्म समाप्त करे। कर्मनिष्ठ ही सुखी होता है। देहधारी सभी कर्मों का त्याग नहीं कर सकता। जो कर्म के फल का त्याग करता है, वही त्यागी कहा जाता है। इन्द्रियादि 'करण' अपने कार्य में तत्पर रहते ही हैं, ऐसा विचार कर जो अहंभाव को छोड़ कर्मनिष्ठ रहता है, वह ज्ञान- प्राप्ति के बाद क्रियमाण कर्मों में लिप्त नहीं होता। इस प्रकार योग और योगियों के कुछ लक्षण तुमसे संक्षेप में कहे। अब हे कुलेशानि ! तुम और क्या सुनना चाहती हो ?