भारतकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 84 में से

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४८ हिन्दी कुलार्णव से नवमी को एक वर्ष से नौ वर्ष तक की कन्याओं की पूजा करे । ये नौ हैं—१ सरस्वती, २ रमा, ३ गौरी, ४ दुर्गा, ५ चन्द्रमुखी, ६ हरप्रिया, ७ उमा, ८ भीमा और ६ शान्ता । ‘ॐ ॐ ॐ सरस्वत्यै देवतायै नमः’ आदि क्रम से यथाशक्ति गन्ध, पुष्प, वस्त्रादि से इनकी अलग-अलग पूजा करे । देवता समझते हुए विविध पदार्थों से इन्हें सन्तुष्ट करे । ताम्बूल और दक्षिणा देकर इन्हें विदा करे । ऐसा करनेवाला साधक पुण्यात्मा होकर देवी का प्रीतिभाजन होता है । हे पार्वति ! यदि युवा स्त्रियाँ सुलभ हों तो नवरात्रों में साधक भक्तिपूर्वक उन्हें निमंत्रित कर पूर्ववत् १ हृल्लेखा, २ गगना, ३ रक्ता, ४ महच्चण्डा, ५ करालिका, ६ इच्छा, ७ ज्ञाना, ८ क्रिया और ६ दुर्गा के रूप में उनकी पूजा करे । साथ ही वटुक और गणेश-रूप में बालकों का भी पूजन विधिवत् करे । इस प्रकार हे देवि ! जो वर्ष में या छठे मास में या तीसरे मास में या प्रति मास व्रतपूर्वक पूजन करता है, वह सभी ऐश्वर्यों को प्राप्त कर हमारा प्रिय होता है । भृगुवार को हे कुलेशानि ! सर्वलक्षणा, मन्दहासा, पुष्पिणी युवा स्त्री को स्नान कराकर सादर निमन्त्रित कर आसन पर बैठावे । गन्ध, पुष्प, वस्त्रादि से उसे सजावे । अपने को भी हे कुलेश्वरि ! गन्धपुष्पादि से अलंकृत करे । फिर देवता का आवाहन कर सविधि पूजन करे । अत्यन्त भक्तिपूर्वक मांसादि पदार्थों से उसे सन्तुष्ट करे । फिर प्रौढान्तोल्लास से युक्त उसका दर्शन करता हुआ मन्त्र का जप करे । स्वयं यौवनोल्लास से युक्त रहे और उसका ध्यान करता रहे । इस प्रकार निर्विकार चित्त से १०८ सहस्र जप कर जपफल समर्पित कर विहार करे । तीन, पाँच, सात, नौ भृगुवारा में जो इस विधि से पूजन करता

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