संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| १०६ | * कूर्मपुराण * |
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| त्वमात्मा सर्वभूतानां प्रधानं प्रकृतिः परा।<br>वैराग्यैश्वर्यनिरतो रागातीतो निरञ्जनः॥ २६॥<br><br>त्वं कर्ता चैव भर्ता च निहन्ता सुरविद्विषाम्।<br>त्रातुमर्हस्यनन्तेश त्राता हि परमेश्वरः॥ २७॥<br>इत्थं स विष्णुर्भगवान् ब्रह्मणा सम्प्रबोधितः।<br>प्रोवाचोन्निद्रपद्माक्षः पीतवासासुरद्विषः॥ २८॥<br><br>किमर्थं सुमहावीर्याः सप्रजापतिकाः सुराः।<br>इमं देशमनुप्राप्ताः किं वा कार्यं करोमि वः॥ २९॥<br><p align="center">देवा ऊचुः</p>हिरण्यकशिपुर्नाम ब्रह्मणो वरदर्पितः।<br>बाधते भगवन् दैत्यो देवान् सर्वान् सहर्षिभिः॥ ३०॥<br><br>अवध्यः सर्वभूतानां त्वामृते पुरुषोत्तम।<br>हन्तुमर्हसि सर्वेषां त्वं त्रातासि जगन्मय॥ ३१॥<br><br>श्रुत्वा तद्देवैरुक्तं स विष्णुर्लोकभावनः।<br>वधाय दैत्यमुख्यस्य सोऽसृजत् पुरुषं स्वयम्॥ ३२॥<br><br>मेरुपर्वतवर्ष्माणं घोररूपं भयानकम्।<br>शङ्खचक्रगदापाणिं तं प्राह गरुडध्वजः॥ ३३॥<br>हत्वा तं दैत्यराजं त्वं हिरण्यकशिपुं पुनः।<br>इमं देशं समागन्तुं क्षिप्रमर्हसि पौरुषात्॥ ३४॥<br>निशम्य वैष्णवं वाक्यं प्रणम्य पुरुषोत्तमम्।<br>महापुरुषमव्यक्तं ययौ दैत्यमहापुरम्॥ ३५॥<br>विमुञ्चन् भैरवं नादं शङ्खचक्रगदाधरः।<br>आरुह्य गरुडं देवो महामेरुरिवापरः॥ ३६॥<br>आकर्ण्य दैत्यप्रवरा महामेघरवोपमम्।<br>समाचचक्षिरे नादं तदा दैत्यपतेर्भयात्॥ ३७॥<br><p align="center">असुरा ऊचुः</p>कश्चिदागच्छति महान् पुरुषो देवचोदितः।<br>विमुञ्चन् भैरवं नादं तं जानीमोऽमरार्दन॥ ३८॥<br><br>ततः सहासुरवरैर्हिरण्यकशिपुः स्वयम्।<br>संनद्धैः सायुधैः पुत्रैः प्रह्लादाद्यैस्तदा ययौ॥ ३९॥<br><br>दृष्ट्वा तं गरुडासीनं सूर्यकोटिसमप्रभम्।<br>पुरुषं पर्वताकारं नारायणमिवापरम्॥ ४०॥ | आप सभी प्राणियोंकी आत्मा, प्रधान और परा प्रकृति हैं। आप वैराग्य और ऐश्वर्यमें निरत, रागातीत तथा निरञ्जन हैं। आप ही कर्ता-भर्ता तथा देवताओंसे द्वेष रखनेवालोंके संहर्ता हैं। अनन्तेश! आप ही रक्षा करनेवाले परमेश्वर हैं, आप रक्षा करें॥ २६-२७॥<br><br>ब्रह्माके द्वारा इस प्रकार भलीभाँति प्रबुद्ध किये जानेपर विकसित कमलके समान नेत्रवाले, पीत वस्त्र धारण करनेवाले तथा असुरोंके द्वेषी भगवान् विष्णु बोले—अत्यन्त वीर्यशाली देवताओ! आपलोग प्रजापतियोंके साथ इस स्थानपर किस कारणसे आये हैं अथवा मैं आप लोगोंका कौन-सा कार्य करूँ?॥ २८-२९॥<br><br>देवता बोले—भगवन्! ब्रह्माके द्वारा प्राप्त वरदानके कारण घमंडसे भरा हुआ हिरण्यकशिपु नामका दैत्य ऋषियोंसहित सभी देवताओंको पीड़ित कर रहा है। हे पुरुषोत्तम! आपको छोड़कर अन्य सभी प्राणियोंसे वह अवध्य है। जगन्मय! आप उसे मारनेमें समर्थ हैं, आप ही सभीके रक्षक हैं। देवताओंके द्वारा कही गयी उस बातको सुनकर संसारके रक्षक विष्णुने दैत्यप्रमुख उस हिरण्यकशिपुके वधके लिये स्वयं एक पुरुषको उत्पन्न किया। सुमेरु पर्वतके समान शरीरवाले, घोर रूपवाले, भयानक एवं हाथमें शंख, चक्र, गदा धारण करनेवाले उस पुरुषसे गरुडध्वज (विष्णु)-ने कहा॥ ३०-३३॥<br><br>तुम (अपने) पराक्रमसे उस दैत्यराज हिरण्यकशिपुको मारकर पुनः इस स्थानपर शीघ्र ही वापस लौट आओ। विष्णुका वचन सुनकर शंख, चक्र, गदाधारी वह दूसरे महामेरुके समान देव गरुडपर आरूढ़ होकर भीषण नाद करते हुए अव्यक्त, महापुरुष पुरुषोत्तमको प्रणामकर (हिरण्यकशिपु) दैत्यके महानगरकी ओर गया। महामेघकी गर्जनाके समान नादको सुनकर बड़े-बड़े दैत्योंने दैत्यराजसे (हिरण्यकशिपुसे) भयपूर्वक कहा—॥ ३४-३७॥<br><br>दैत्योंने कहा—देवताओंका विनाश करनेवाले दैत्यराज! देवताओंकी प्रेरणा प्राप्त कर कोई महान् पुरुष भीषण नाद करता हुआ आ रहा है, हमें उसे जानना चाहिये। तदनन्तर मुख्य-मुख्य असुरों तथा आयुधोंसे सुसज्जित प्रह्लाद आदि पुत्रोंके साथ हिरण्यकशिपु स्वयं वहाँ गया। करोड़ों सूर्यके समान प्रभाववाले तथा दूसरे नारायणके समान पर्वताकार गरुडपर बैठे हुए उस |