संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 34, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 34
३२ * कूर्मपुराण *
तीसरा अध्याय
आश्रमधर्मका वर्णन, संन्यास ग्रहण करनेका क्रम, ब्रह्मार्पणका लक्षण तथा निष्कामकर्मयोगकी महिमा
| ऋषय ऊचुः<br>वर्णा भगवतोद्दिष्टाश्चत्वारोऽप्याश्रमास्तथा।<br>इदानीं क्रममस्माकमाश्रमाणां वद प्रभो॥ १॥ | **ऋषियोंने कहा—**प्रभो! आपने चारों वर्णों तथा चारों आश्रमोंका वर्णन किया। अब हमें आश्रमोंका क्रम बतलायें॥ १॥ |
| श्रीकूर्म उवाच<br>ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा।<br>क्रमेणैवाश्रमाः प्रोक्ताः कारणादन्यथा भवेत्॥ २॥ | **श्रीकूर्म बोले—**ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास—ये क्रमसे आश्रम कहे गये हैं। किसी कारणसे (इस क्रममें) परिवर्तन भी होता है॥ २॥ |
| उत्पन्नज्ञानविज्ञानो वैराग्यं परमं गतः।<br>प्रव्रजेद् ब्रह्मचर्यात् तु यदीच्छेत् परमां गतिम्॥ ३॥ | जो ज्ञान-विज्ञान-सम्पन्न हो तथा परम वैराग्यको प्राप्त हो गया हो ऐसा ब्रह्मचारी यदि परमगतिको प्राप्त करना चाहे तो वह ब्रह्मचर्य-आश्रमसे (सीधे) संन्यास ग्रहण कर ले। इसके विपरीत (अर्थात् ब्रह्मचर्य-आश्रमसे सीधे संन्यास न ग्रहण कर) विधिपूर्वक स्त्रीसे विवाह कर विविध यज्ञोंका अनुष्ठान करते हुए पुत्रोंको उत्पन्न करे और विरक्त होनेपर संन्यास ग्रहण करे॥ ३-४॥ |
| दारानाहृत्य विधिवदन्यथा विविधैर्मखैः।<br>यजेदुत्पादयेत् पुत्रान् विरक्तो यदि संन्यसेत्॥ ४॥ | |
| अनिष्ट्वा विधिवद् यज्ञैरनुत्पाद्य तथात्मजम्।<br>न गार्हस्थ्यं गृही त्यक्त्वा संन्यसेद् बुद्धिमान् द्विजः॥ ५॥ | बुद्धिमान् गृहस्थ द्विजको चाहिये कि वह विधिपूर्वक यज्ञोंका अनुष्ठान तथा पुत्रोंको उत्पन्न किये बिना गृहस्थ-आश्रमका परित्यागकर संन्यास ग्रहण न करे। श्रेष्ठ विद्वान् द्विज यदि तीव्र वैराग्यके वेगके कारण गृहस्थाश्रममें रहनेके लिये उत्सुक न हो तो यज्ञ किये बिना भी वहीं संन्यास ग्रहण कर ले॥ ५-६॥ |
| अथ वैराग्यवेगेन स्थातुं नोत्सहते गृहे।<br>तत्रैव संन्यसेद् विद्वाननिष्ट्वापि द्विजोत्तमः॥ ६॥ | |
| अन्यथा विविधैर्यज्ञैरिष्ट्वा वनमथाश्रयेत्।<br>तपस्तप्त्वा तपोयोगाद् विरक्तः संन्यसेद् यदि॥ ७॥ | अन्यथा विविध यज्ञोंका सम्पादन कर वनका आश्रय लेना चाहिये एवं तपोयोगद्वारा तप करनेके बाद यदि विराग हो जाय तो संन्यास लेना चाहिये। वानप्रस्थ-आश्रम ग्रहण कर फिर गृहस्थ-आश्रममें प्रवेश नहीं करना चाहिये, न संन्यासी वानप्रस्थ-आश्रममें वापस आये और न साधक गृहस्थ ब्रह्मचर्याश्रममें वापस लौटे॥ ७-८॥ |
| वानप्रस्थाश्रमं गत्वा न गृहं प्रविशेत् पुनः।<br>न संन्यासी वनं चाथ ब्रह्मचर्यं न साधकः॥ ८॥ | |
| प्राजापत्यां निरूप्येष्टिमाग्नेयीमथवा द्विजः।<br>प्रव्रजेत गृही विद्वान् वनाद् वा श्रुतिचोदनात्॥ ९॥ | विद्वान् गृहस्थ द्विज प्राजापत्य इष्टि अथवा आग्नेयी इष्टिका सम्पादन कर संन्यास ग्रहण करे या वैदिक विधानसे वानप्रस्थसे (संन्यास-आश्रममें) प्रवेश करे। हवन तथा यज्ञ-सम्बन्धी क्रियाओंको करनेमें असमर्थ होनेपर भी अन्धा, लँगड़ा अथवा दरिद्र द्विज वैराग्य होनेपर संन्यास ग्रहण करे। सभीके लिये संन्यासके निमित्त वैराग्यका विधान किया गया है। जो आसक्तियुक्त पुरुष संन्यास-आश्रम ग्रहण करना चाहता है वह अवश्य ही पतित हो जाता है॥ ९-११॥ |
| प्रकर्तुमसमर्थोऽपि जुहोतियजतिक्रियाः।<br>अन्धः पंगुर्दरिद्रो वा विरक्तः संन्यसेद् द्विजः॥ १०॥ | |
| सर्वेषामेव वैराग्यं संन्यासाय विधीयते।<br>पतत्येवाविरक्तो यः संन्यासं कर्तुमिच्छति॥ ११॥ |