भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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छन्दश्चितिगणितप्रकारः । ( ९९ ) अथ छन्दश्चित्यादौ करणसूत्रं श्लोकत्रयम्- अब छन्दका प्रकार इत्यादि जाननेकी रीति तीन श्लोकमें लिखते हैं. एकाद्येकोत्तरा अङ्का व्यस्ता भाज्याः क्रमस्थितैः ॥ परः पूर्वेण संगुण्यस्तत्परस्तेन तेन च ॥ १ ॥ ३० ॥ एकद्वित्र्यादिभेदाः स्युरिदं साधारणं स्मृतम् ॥ छन्दश्चित्युत्तरे छन्दस्युपयोगोऽस्य तद्विदाम् ॥ २ ॥३१॥ मूषावहनभेदादौ खण्डमेरौ च शिल्पके ॥ वैद्यके रसभेदीये तन्नोक्तं विस्तृतेर्भयात् ॥ ३ ॥ ३२ ॥ अन्वयः-एकाद्येकोत्तराः व्यस्ताः अङ्काः क्रमस्थितैः भाज्याः परः पूर्वेण संगुण्यः तत्परः तेन तेन इति अङ्कान्तं क्रिया कार्या ॥ १ ॥ एवम् एकद्वित्र्यादिभेदा स्युः । इदं साधारणं स्मृतम् । छन्दश्चित्युत्तरे छन्दसि तद्विदाम् अस्य उपयोगो भवति ॥२॥ मूषावहनभेदादौ खण्डमेरौ शिल्पके रसभेदीये वैद्यके च अस्य उपयोगो भवति तत् अत्र विस्तृतेः भयात् न उक्तम् ॥ ३ ॥ अर्थः-जितने अङ्क हों, उनको एक २ बढाकर उलटा लिखे और उनके नीचे एक २ बढाकर एक आदिक्रमसे अङ्क लिखे यह दो पंक्ति हुई, इसमें ऊपरकी पंक्तिको भाज्य और नीचेकी पंक्तिको भाजक माने. अर्थात् आदि अङ्कके नीचे एकको हर जाने इस प्रकार क्रमसे एक २ के नीचे एक २ को हर माने और सबको जुदा २ लिखे. सब अङ्कोंमें पहले अंकको सिद्ध अंक जानें, इस सिद्ध अंकसे अगले भाज्य अंकसे गुणा करे फिर उसी भाज्यके नीचेके अंकका भाग दे, फिर जो लब्धि हो उसको सिद्ध अंक जानें, इस सिद्ध अंकको आगेकें भाज्य अंकसे गुणा करे और उसके नीचेके भाजकका भाग दे इस प्रकार जहाँ तक अंक हों तहाँ तक क्रिया करे. इस प्रकार क्रमसे एक, दो, तीन आदिक भेद होते हैं. अथवा-जितने भाज्य भाजक अङ्क हों, सबको पहलेके अंकसे आगेको गुणा कर ले, फिर जो अंक गुणनसे निष्पन्न हों उसमें नीचे लिखे हुए भाजक अंकोंका अलग २ भाग देनेसे जो लब्धि आवे वह भी क्रमसे एक, दो, तीन आदिक भेद होंगे. यह रीति यहाँ साधारण रीतिसे लिखी है ॥ छन्दोंका प्रस्तार जाननेके विषयमें छन्दःशास्त्रमें छन्दःशास्त्र जाननेवालोंको इसका उपयोग होता है (काम पडता है) और द्वारोंकी वायुके भेद जाननेमें छन्दःशास्त्रान्तर्गत खण्डमेरूमें तथा शिल्पशास्त्रमें, रसभेदविषयक वैद्यकमें भी इसका उपयोग होता है यहां ज्यादा विस्तार होगा इस कारण नहीं लिखा है ॥१॥२॥३॥