भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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( १०८ ) लीलावती । अन्त्यधनम् ७४ सर्वधनम् ५८५ फैलाव-जो पहले दिन दिया जाता है उसको आदिधन कहते हैं और जिस धनकी बढतीसे दिया जाय वह चय कहाता है और जितने दिन दिया जाता है वह दिन गच्छ कहाते हैं. इस प्रकार इस उदाहरणमें आदि धन ४ चार है क्योंकि पहले दिन ४ चार दिया है और पांच चय है क्योंकि पांचकी वृद्धिसे दिया है और पन्द्रह १५ गच्छ है. क्योंकि पन्द्रह १५ दिन दिया है. अब यहां मध्यधन जाननेके वास्ते ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार पद १५ पन्द्रहमें एक १ कम किया तब १४ चौदह रहे. इनसे चय ५ पांचको गुणा किया तब ७० सत्तर हुए. इनमें मुख ४ चारको जोडा तब ७४ चौहत्तर हुए, यह अंत्यधन हुआ अर्थात् अन्तके पन्द्रहवें दिन ७४ चौहत्तर दिया, फिर इसी अंत्यधन ७४में मुख ४ जोडा तब ७८ अठहत्तर हुए आधा किया तब ३९ उनतालीस हुए यह मध्य धन हुआ. इस मध्य धन ३९ को पद १५ पन्द्रहसे गुणा किय तब ५८५ पांचसौ पचासी हुए. यह सर्वधन हुआ. अर्थात् पन्द्रह दिनमें सब ५८५ इतना दिया इस प्रकार मध्यधन ३९ अन्त्यधन ७४ सर्वधन ५८५ हुआ. उदाहरणान्तरम्- दूसरा उदाहरण- आदिः सप्त चयः पञ्च गच्छोऽष्टौ यत्र तत्र मे ॥ मध्यान्त्यधनसंख्ये के वद् सर्वधनञ्च किम् ॥ २ ॥ अन्वयः-यत्र आदिः सप्त चयः पञ्च गच्छः अष्टौ तत्र मध्यान्त्यधन संख्ये के सर्वधनं च किम् ? इति मे वद ॥ २ ॥ अर्थः-जहां आदिधन सात है, चयधन पांच ५ है और गच्छ ८ आठ है, वहां मध्यधन और अन्त्यधनकी क्या संख्या होगी और सर्वधन क्या होगा ? यह मुझसे कहो ॥ २ ॥ न्यासः--आदि ० ७ । च ० ५ । ग ० ८ । मध्यधनम् ४९/२ अन्त्यधनम् ४२ सर्वधनम् १९६ ॥