लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रेढीव्यवहारः । ( ११५ ) सम अर्द्धसम विषम इत्यादि छन्दोंके भेद जाननेकी रीति डेढ श्लोक आर्याछन्दमें लिखते हैं- पादाक्षरमितगच्छे गुणवर्गफलञ्चये द्विगुणे ॥ ३९ ॥ समवृत्तानां संख्या तद्वर्गो वर्गवर्गश्च ॥ स्वस्वपदानौ स्यातामर्द्धसमानाञ्च विषमाणाम् ॥ ४० ॥ अन्वयः-पादाक्षरमितगच्छे चये द्विगुणे यत् गुणवर्गफलं सा समवृत्तानां संख्या भवति । तद्वर्गः वर्गवर्गः च पृथक् स्वस्वपदोनौ अर्द्धसमानां विषमाणां च संख्ये स्याताम् ॥ ४० ॥ अर्थः-पादके जितने अक्षर हों उसको गच्छ माने और चयको दूना करै तब ऊपर कही हुई गुणवर्गकी रीतिके अनुसार जो फल आवेगा सो समवृत्तोंकी संख्या होगी और उस फलका वर्ग करके समवृत्तकी संख्या घटाकर जो शेष रहेगा सो अर्द्ध सम वृत्तोंकी संख्या होगी और पहला जो वर्गफल है, उसका वर्ग करके पहला वर्गफल घटा देनेसे जो शेष रहेगा सो विषमवृत्तोंकी संख्या होगी ॥ ४० ॥ उदाहरणम्- समानामर्द्धतुल्यानां विषमाणां पृथक्पृथक् ॥ वृत्तानां वद मे संख्यामनुष्टुप्छन्दसि द्रुतम् ॥ १ ॥ अन्वयः-हे सखे ! अनुष्टुप्छन्दसि समानाम् अर्द्धतुल्यानां विषमाणां च वृत्तानां संख्याम् मे पृथक् पृथक् द्रुतम् वद ॥ १ ॥ अर्थः-हे मित्र ! अनुष्टुप् छन्दसे सम, अर्द्धसम और विषम, वृत्तोंकी भी संख्या मुझसे अलग अलग शीघ्र कहो ॥ १ ॥ न्यासः-उत्तरो गुणः २ । गच्छः ८ । लब्धाः समवृत्तानां संख्याः २५६ । तथाऽर्द्धसमानाम् ६५२८० । विषमाणाञ्च ४२९४९०१७६० । फैलाव-इस उदाहरणमें अनुष्टुप् छन्दके विषयका प्रश्न है इस कारण अनुष्टुप् छन्दके पादक अक्षर ८ आठको गच्छ माना और चय २ को दूना किया फिर गुणव- र्गकी रीति करी; अर्थात् यहां आदि चय २ दो है;इस कारण सम अंक होनेसे आधा करके वर्ग स्थापन किया, फिर शेष १ एक विषम हैं; इस कारण १ घटा दिया और गुण स्थापन किया; अब यहाँ पहिले नीचेकी तरफ वर्ग लिखा है; इस कारण गच्छ