लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षेत्रव्यवहारः। (१३१) प्रमाणमें एक स्थानमें जोडै और एक स्थानमें घटावे फिर उन दोनोंका आधा २ करे तब क्रमसे कर्ण और कोटिका प्रमाण मालूम होता है ॥ ९ ॥ उदाहरणम्- यदि समभुवि वेणुर्द्वित्रिपाणिप्रमाणो गणक पवन- वेगादेकदेशे स भग्नः ॥ भुवि नृपमितहस्तेष्वंगलग्नं तदग्रं कथय कतिषु मूलादेष भग्नः करेषु ॥ ६ ॥ अन्वयः-हे गणक ! हे अङ्ग ! यः द्वित्रिपाणिप्रमाणः वेणुः भुवि निखातः सः यदि पवनवेगात् भग्नः तर्हि तदग्रम् भुवि नृपमितहस्तेषु लग्नम् तदा कथय एषः मूलात् कतिषु करेषु भग्नः ॥ ६ ॥ अर्थः-हे प्रिय गणक ! जो बाँस ३२ हाथका पृथ्वीमें गढा है; वह यदि वायुके वेगसे एक जगह टूटा तो उसका अग्रभाग पृथ्वीमें १६ हाथपर जाके लगा तो कहो यह बाँस जडसे कितने हाथ ऊपर टूटा ? ॥ ६ ॥ न्यासः [चित्र: ३२, १२, २०, १६] वंशाग्रमूलान्तरभूमिः १६ वंशः ३२ स एव कोटिकर्णयुतिः ३२ । भुजः १६ जाते ऊर्ध्वाधःखण्डे २० । १२ ॥ फैलाव-यहाँ वंशके अग्रभाग और मूलभागके मध्यभूमिका प्रमाण १६ सोलह ही भुज प्रमाण है और बांसका प्रमाण ३२ ही कोटिकर्णका योग है; अब यहां कोटिकर्ण अलग २ जाननेके अर्थ उपरोक्त रीतिके अनुसार बांसके अग्रभाग और मूलके मध्यकी भूमिके प्रमाण अर्थात् भुज १६ का वर्ग किया तब २५६ हुए; इनमें कर्णकोटिक योग अर्थात् वंशके प्रमाण ३२का भाग दिया तब ८ आठ लब्धि हुए इनको कर्णकोटिक योग ३२ में एक स्थानमें जोडा और एक स्थानमें घटाया तब ४० । २४ हुए; इनको अलग २ आधार किया तब क्रमसे कर्ण और कोटिका प्रमाण २० । १२ हुए अर्थात् कर्णका प्रमाण २० और कोटिका प्रमाण १२ हुआ. आशय CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri