भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 268 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 159

क्षेत्रव्यवहारः। ( १४३ ) अर्थः-जिस त्रिभुजक्षेत्रमें १४ प्रमाण भूमि हैं और दोनों भुज १३ और १५ प्रमाण हैं तहां लम्ब और दोनों अवबाधा तथा चतुष्कोणरूप फलका प्रमाण भी शीघ्र कहो ॥ १४ ॥ न्यासः- भूः १४ भुजौ १३ । १५ लब्धे आबाधे ५ । ९ । लम्बश्च १२ क्षेत्रफलञ्च ८४ ॥ फैलाव-इस त्रिभुजक्षेत्रमें भूमि १४ दोनों भुज १३ । १५ हैं यहाँ आबाधा जान- नेको उपरोक्त नियमानुसार ऊपरके दोनों भुजों १३ । १५ का योग किया तब २८ हुए, इन ही दोनोंको अन्तर २ से गुणा किया तब ५६ हुए, भूमि मानी हुई भुज १४ का भाग दिया तब ४ लब्धि हुए, इन्हें भूमि १४ में एक स्थानमें घटाया और एक स्थानमें जोडा तब १० । १८ हुए इनको आधा किया तब क्रमसे आबाधा मिली ५ । ९ अर्थात् पहली भुजकी आबाधा ५ और दूसरी भुजकी आबाधा ९ मिली, फिर लम्ब जाननेके लिये अपनी अपनी भुज और आबाधाका वर्ग किया उस वर्गका अन्तर किया उस अन्त- रका मूल लिया, तब लम्ब हुआ जैसे पहली भुज १३ का वर्ग १६९ हुए और पहली आबाधा ५ का वर्ग २५ हुआ, इनका अन्तर लिया तब १४४ बचे, इसका मूल लिया तब १२ मिले यही लम्बका प्रमाण है, इसी प्रकार दूसरी भुज १५ का वर्ग किया तब २२५ हुए उसीकी आबाधा ९ का वर्गकिया तब ८१ हुए इनका अन्तर लिया तब १४४ बचे इनका मूल लिया तब वही लम्बका प्रमाण १२ मिला, फिर क्षेत्रफल जाननेके लिये भूमि १४ के आधे ७ को लम्ब १२ से गुणा किया तब ८४ हुए. यही क्षेत्रफल होगा ॥ ऋणाबाधोदाहरणम्-ऋणआबाधा जाननेका उदाहरण- दशसप्तदशप्रमौ भुजौ त्रिभुजे यत्र दशप्रमा मही ॥ अबधे वद लम्बकं तथा गणितं गणितिकाऽऽशु तत्र मे ॥ १५ ॥ अन्वयः-यत्र त्रिभुजे दशसप्तदशप्रमौ भुजौ नवप्रमा मही हे गणितिक ! तत्र अबधे लम्बकं तथा गणितम् मे आशु वद ॥ १५ ॥ अर्थः-जिस त्रिभुजक्षेत्रमें दश और सत्रह प्रमाण तो दोनों भुज हैं और नौ प्रमाण