लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
पृष्ठ 163, कुल 268 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्षेत्रव्यवहारः। ( १४७ ) सर्वदोर्युतिदलमित्यादिना त्रिभुजे स्पष्टफलायनाय अत्र त्रिभुजस्य पूर्वोदाहृतस्य न्यासः-भूमिः १४ भुजौ १३ । १५ अनेनापि प्रकारेण त्रिबाहुके तदेव वास्तवं फलम् ८४ अत्र चतुर्भुजस्या- स्पष्टमुदितम् ॥ फैलाव-सर्वदोरीत्यादि ऊपर कही हुई रीतिसे त्रिभुजक्षेत्रमें स्पष्ट फल लानेके निमित्त यहां पूर्व उदाहरण दिये हुए ही त्रिभुजपर गणित करते हैं. यहां तीनों भुजों १३ । १५ । १४ का योग किया तब ४२ हुए; इनका आधा २१ कर चार स्थानोंमें लिखा; इनमेंसे अलग अलग एक २ भुजको घटाया तब क्रमसे शेष रहा ८ । ६ । ७ । २१ इनका घात किया तब ७०५६ हुए; इनका मूल लिया तो मिले ८४ यही क्षेत्रफल हुआ और पहले जो क्षेत्रफल लाये थे यह उसीके तुल्य है; इस कारण यह स्पष्ट फल है चतुर्भुजका तो अस्पष्ट फल दिखा चुके हैं. अथ स्थूलत्वनिरूपणार्थं सूत्रं सार्द्धं वृत्तम्- जिस रीतिके अनुसार चतुर्भुजका स्थूल आता है; वह रीति पीछे कह आये हैं; तहां जो स्थूलत्व है उसके दिखानेको नियम लिखते हैं; चतुर्भुजस्यानियतौ हि कर्णौ कथं ततोऽस्मिन्नियतम्फलं स्यात् ॥ प्रसाधितौ तच्छ्रवणौ यदाद्यैः स्वकल्पितौ तावितरत्र न स्तः ॥२०॥ अन्वयः-हि चतुर्भुजस्य कर्णौ अनियतौ ततः अस्मिन् फलं नियतं कथं स्यात् । यत् आद्यैः स्वकल्पितौ तच्छ्रवणौ प्रसाधितौ तौ इतरत्र न स्तः॥ २० ॥ अर्थः-निश्चय है कि, चतुर्भुजमें कर्ण अनियत है अर्थात् एक ही क्षेत्रमें अनेक प्रकारके कर्ण होते हैं तिस कारण यहां नियत फल किस प्रकार हो सकता है और जो प्राचीनोंने अपने अपने कल्पना किये हुए चतुर्भुजमें कर्ण साधन किये हैं वह सब स्थानमें नहीं हो सकते ॥ २० ॥ तेष्वेव बाहुष्वपरौ च कर्णावनेकधा क्षेत्रफलं ततश्च ॥ अन्वयः-तेषु एव बाहुषु कर्णौ अनेकधा भवतः।ततः क्षेत्रफलंच अनेकधा भवति॥