भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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( १५४ ) लीलावती । अथान्यदुदाहरणम्-और उदाहरण दिखाते हैं- पञ्चाशदेकसहिता वदनं यदीयं भूः पञ्चसप्ततिमिता प्रमितोऽष्टषष्ट्या ॥ सव्यो भुजो द्विगुणविंशतिसम्मितोऽ- न्यस्तस्मिन्फलं श्रवणलम्बमिती प्रचक्ष्व ॥ १९ ॥ अन्वयः-एकसहिता पञ्चाशत यदीयं वदनम् । पञ्चसप्ततिमिता भूः अष्टषष्ट्या प्रमितः सव्यः भुजः । द्विगुणविंशतिसम्मितः अन्यः भुजः । तस्मिन् फलं श्रवणलम्बमिती च प्रचक्ष्व ॥ १९ ॥ अर्थः-५१ इक्यावन जिस क्षेत्रका मुख है; ७५ प्रमाण भूमि है, ६८ प्रमाण दायाँ भुज है, ४० प्रमाण बायाँ दूसरा भुज है; उस क्षेत्रमें फल और कर्ण तथ लम्बका प्रमाण भी कहो ॥ १९ ॥ न्यासः- वदनम् ५१ भूमिः ७५ भुजौ ६८ । ४० यहाँ मुख ५१ हैं; भूमि ७५ हैं; दोनों भुज ६८ । ४८ हैं; अत्र फलावलम्बश्रुतीनां सूत्रं वृत्तार्द्धम्- ऊपर दिखाये हुए क्षेत्रमें फल; लम्ब और कर्णके विषयमें सूत्र आधा श्लोक- ज्ञातेऽवलम्बे श्रवणः श्रुतौ तु लम्बः फलं स्यान्नियतं तु तत्र ॥ कर्णस्यानियतत्वाल्लम्बोऽप्यनियत इत्यर्थः ॥ अन्वयः-अवलम्बे ज्ञाते श्रवणः ज्ञातः स्यात् । श्रुतौ ज्ञातायां लम्बः ज्ञातः स्यात् तत्र फलं तु नियतं स्यात् ॥ अर्थः-नियत लम्ब जाननेसे नियतकर्ण ज्ञात होता है; नियतकर्ण जाननेपर नियत लम्ब ज्ञात होता है; अर्थात् लम्ब जाननेसे कर्ण जाना जाता है और कर्ण जाननेसे लम्ब जाना जाता है और लंब या कर्णके नियत होनेसे फल भी नियत होता है और यदि कर्ण सम्मुख दोनों कोणोंके खेंचनेसे अनियत हो तो लम्ब भी अनियत होता है और कर्णोंके ही अनियत होनेसे एक ही क्षेत्रके अनेक रूप