लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षेत्रव्यवहारः। ( १६६ ) है; यही उस चतुर्भुजमें समलम्ब है जब विषमचतुर्भुजमें यह समलम्ब पड़ता है तब उस क्षेत्रका स्वरूप ऐसा होता है, अब यहां कर्ण जाननेके लिये पहिले कही हुई रीतिके अनुसार छोटी आबाधा ३/५ को भूमिमेंसे घटाया तब २९७/५ शेष रहे, इनके वर्ग ८८२०९/२५ में लम्बके वर्ग ३६०९६/२५ को जोड़ा तब १२४३०५/२५ हुए; वहां अंशमें छेदका भाग देनेसे मिले ५०४९ इसका ठीक मूल नहीं मिलता; परन्तु आसन्नमूल लिया तब ७१ ९/१० मिले, यह एक कर्ण हुआ, यह छोटी आबाधाकी ओरके लम्बके शिरसे लग रहा है; इसी प्रकार दूसरी आबाधाको भूमिमें घटा- कर पूर्वोक्त क्रिया करनेसे दूसरे कर्णका प्रमाण ४६ १३/१० हुआ। इस प्रकार समलम्ब विषम चतुर्भुजमें अनेक प्रकारके कर्ण हो सकते हैं, इस प्रकार यद्यपि कर्ण अनियत हैं तथापि ब्रह्मगुप्त आदि प्राचीनोंने नियत ही कर्ण माने हैं॥ तदानयनं यथा- ब्रह्मगुप्त आदिकोंने जिस प्रकार नियत कर्ण माने हैं, सो साधते हैं- कर्णाश्रितभुजघातैक्यमुभयथान्योन्यभाजितं गुणयेत् ॥ योगेन भुजप्रतिभुजबधयोः कर्णौ पदे विषमे ॥ ३२ ॥ अन्वयः-विषमे उभयथा कर्णाश्रितभुजघातैक्यम् भुजप्रतिभुजवधयोः योगेन गुणयेत् । तत् अन्योन्यभाजितं कुर्य्यात् । तदा उभयत्र फल्योः पदे कर्णौ स्तः॥३२॥ अर्थः-विषम चतुर्भुजमें दोनों ओरसे कर्णको स्पर्श करनेवाली दोनों भुजाओंके घातका योगकर उसको भूमि और मुखके घातमें दोनों भुजोंका घात जोडकर जो अङ्क हों उनसे अलग अलग गुणा करे, तब जो दोनों स्थानमें गुणनफल हों उनमें बिनगुणे उन ही अङ्कोंका परस्पर भाग दे तब जो दोनों स्थानोंमें फल हों उनका मूल ले तब दोनों कर्णलब्धि होते हैं॥ ३२ ॥