भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

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क्षेत्रव्यवहारः। (१८९) वृत्तान्तर्नवसुजे भुजमानाऽऽनयनाय । व्यासः २००० कुरामदशवेदै- ४१०३१गुणितः ८२०६२००० खखखाभ्रार्कै १२०००० भक्ते लब्धं नवास्त्रे भुजमानम् ६८३ १७/२० एवमिष्टव्यासादिभ्योऽन्या अपि जीवाः सिद्धयन्तीति तास्तु गोले ज्योत्पत्तौ वक्ष्ये ॥ फैलाव—जिस वृत्तक्षेत्रमें व्यासका प्रमाण २००० दो हजार है, उसके भीतर खेंचे हुए त्रिभुज क्षेत्रकी भुजाओंका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई राशिके अनुसार व्यासके प्रमाण २००० को एक लाख तीन हजार नौसौ तेईस १०३९२३ से गुणा किया तो २०७८४६००० बीस करोड अठत्तर लाख छियालीस हजार हुए, इसमें १२०००० एक लाख बीस हजारका भाग दिया तो १७३२ ९/२० मिले, यही वृत्तक्षेत्रान्तर्गत त्रिभुजकी भुजाका प्रमाण है ॥ अब उसी २००० व्यासवाले वृत्तक्षेत्रमें चतुष्कोण क्षेत्रके भुजका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीति के अनुसार व्यास प्रमाण २००० को चौरासी हजार आठसौ तिरपन ८४८५३ से गुणा किया तब १६९७० ६००० सोलह कोटि सतानबे लाख छ हजार हुए, इसमें एक लाख बीस हजार १२०००० का भाग दिया तब १४१४ १३/६० लब्धि हुए; यही वृत्तक्षेत्रान्तर्गत चतुर्भुजका भुजकी प्रमाण है ॥ अब उसी व्यास २०० वाले वृत्तक्षेत्रमें होनेवाले पंच कोण क्षेत्रकी भुजाका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कहीं हुई रीति के अनुसार व्यास प्रमाण २००० का सत्तर हजार पाँचसौ चौंतीस ७०५३४ से गुणा किया तब १४१०६८००० चौदह कोटि दशलाख अडसठ हजार हुए; इसमें १२००० एक लाख बीस हजारका भाग दिया तब ११७५ १७/३० लब्धि हुए; यही वृत्तक्षेत्रान्तर्गत पंच- कोणका भुजाका प्रमाण है ॥