भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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( ८ ) लीलावती । अर्थ:-हे बाले ! हरिणशावकनयनि ! हे चातुर्यकी खानि ! शुभे ! लीलावति यदि रूपकी, स्थानकी, विभागकी और खण्डकी रीतिसे गुणा करना जानती हो तों कहो ? १३५ एकसौ पेंतीसको यदि १२ बारहसे गुणा किया तों कितने होते हैं यह सब रीतियोंसे कहो और वही गुणा किये हुए अंक १२ बारहसे भाग देनेसे- कितने होते हैं सो कहो ॥ २ ॥ न्यासः-गुण्यः १३५ गुणकः १२ गुण्यान्त्यमंकं गुणकेन हन्यादिति कृते जातम् १६२० फैलाव-पूर्वोक्त गुणाकी रीतिसे गुण्य १३५ के अन्तके ५ को गुणक १२ १३५ बारहसे गुणा तो ६० साठ हुए. तिसमेंसे साठके शून्यका १२ गुण्यगुणकके नीचे इकाईके स्थानमें रक्खा और शेष छ ६ को १६२० स्मरण रक्खा; फिर गुणकसे अन्तके समीपके ३ तीन को गुणा तो १२ बारह तिया ३६ छत्तीस हुए; इसमें पहले ६० साठमें छ जोड दिये तो ४२ बयालीस हुए; इसमेंसे अन्तका दोका अंक पूर्व शून्यके वामभागमें दहाईके स्थानमें रक्खा और शेष ४चारको स्मरण रक्खा और तीसरे १ एकके अंकको गुणकसे गुणा किया अर्थात् १२ एकान १२ बारहमें पहले बयालीसमेंके चारको जोड दिया तब सोलह हुए इनको पहले रक्खे हुए अङ्कोंके वामभागमें रक्खा तब १६२० एक हजार ६ छ सौ बीस २० फल होता है ॥ यह रीति सर्वत्र प्रचलित है ॥ और “अंकानां वामतो गतिः”- अंकोंकी वामभागसे गिनती होती है इस रीतिसे गुण्यमें अंतका अंक १ एक १२३५ अंतके अंकका गुणा. होता है उसको १२ बारहसे गुणा तो १२३५ १५६५ द्वितीयांकका गुणा. एकहजार दोसौ पेंतीस हुए. अर्थात् अंतके १६२० तृतीयांकका गुणा. अंकको गुणक १२ बारहसे गुणा तो १२ यही फल हुआ. बारह हुए. उनको अंतके १ अंकके स्थानमें रक्खा तब पूर्वोक्त फल हुआ, फिर अंतके समीपके ३ तीन द्वितीयांकको गुणकसे गुणा तब बारह तिया ३६ छत्तीस हुए, उनमेंसे छ को गुण्य अंक ३ तीनके स्थानमें रक्खा और ३ तीनको शतस्थानी २ के नीचे लिखा और जोड दिया तब १५६५ एक हजार पांचसौ पैंसठ हुआ. फिर तृतीयांक ५ पांचको गुणक १२ से गुणा तो बारह पांचे ६० हुए; इसमेंसे शून्यको गुण्य पांचके स्थानमें लिखा और ६ छःको दशस्थानी ६ में जोडा तो १२ बारह हुए. दो २ को दशस्थानमें लिखा और शेष १ एकको शतस्था- CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri