भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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( २४४ ) लीलावती । अत्राङ्कैक्यं १३ निरेकम् १२ एतन्निरेकस्थानान्तमे- कापचितमेकादिभिश्च भक्तं जातम् १२/१ ११/२ १०/३ ९/४ एषां घातसमा जाताः संख्याभेदाः ४९५ इति श्रीलीलावत्यामंकपाशः समाप्तः । फैलाव-यहां दिये हुए अंकोंका योग १३ है, इसमें ऊपर कही हुई रीतिके अनु- सार एक घटाया तो १२ रहे, इनमें एक एक घटाया तथा ऊपर कहे हुए स्थानोंसे एक कम स्थानमें अर्थात् चारस्थानोंमें रक्खा १२ । ११ । १० । ९-फिर इनके नीचे एक आदि हर लगाये १२/१ ११/२ १०/३ ९/४ इनके अंश और हरोंका घात किया तो ११८८०/२४ हुए यहां अंश ११८८० में हर २४ का भाग दिया तब ४९५ लब्ध हुए; यही ऊपर दिये हुए उन पाँचों स्थानोंके अङ्कोंके भेदोंकी संख्या है. जिनका योग तेरह था. इस रीतिमें जो ऊपर नियम कहा है, वह भी यहाँ है, क्योंकि नौ और स्थानसंख्या ५ का योग १४ हुआ; इससे प्रश्नमें दिये हुए अङ्कोंका योग कम हैं. इति अङ्कपाशः । न गुणो न हरो न कृतिर्न घनः पृष्टस्तथापि दुष्टानाम् ॥ गर्वितगणकबहूनां स्यात्पातोऽवश्यमंकपाशेऽस्मिन् ॥ ८२ ॥ अन्वयः-अस्मिन् अंकपाशे गुणः न हरः न कृतिः न घनः न तथापि दुष्टानां गर्वि- तगणकबहूनां यदा पृष्टः तदा एव अवश्यं पातः स्यात् ॥ ८२ ॥ अर्थः-इस अंकपाशमें गुणा नहीं है, भाग नहीं है, वर्ग नहीं है, घन नहीं है, तो भी इस अंकपाशमें दुष्टात्मा घमण्ड करनेवाले गणकोंका प्रश्न करनेके समय ही अवश्य पात होगा ॥ ८२ ॥ येषां सुजातिगुणवर्गविभूषिताङ्गी शुद्धाखिलव्यवहतिः खलु कण्ठसक्ता ॥ लीलावतीह सरसोक्तिमुदाहरन्ती तेषां सदैव सुखसम्पदुपैति वृद्धिम् ॥ ८३ ॥ अन्वयः-इह खलु सुजातिगुणवर्गविभूषिताङ्गी शुद्धाखिलव्यवहतिः सरसोक्तिम् उदाहरंती लीलावती येषां कण्ठसक्ता तेषां सुखसम्पत् सदा एव वृद्धिम्उपैति ८३॥ अर्थः-इस संसारमें निश्चयकरके अनेक प्रकारके गुणोंकी रीति वर्गकी रीतिसे शोभायमान स्पष्ट हैं सम्पूर्ण गणितकी रीतियें जिसमें सुन्दर रसयुक्त है उदा- हरण जिसमें ऐसी यह लीलावती ( ग्रन्थ ) जिनके कण्ठस्थ होती है, उनकी सुखसम्पत्ति वृद्धिको प्राप्त होती है; दूसरा अर्थ-इस असार संसारमें निश्चयकरके

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