भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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( १६ ) लीलावती । वर्ग करनेकी तीसरी रीति. यह विधि दो अंकके वर्गमें सरल पडती है ॥ ( सू० १३) खण्डद्वयस्याभिहतिर्द्विनिघ्नी तत्खण्डवर्गैक्ययुता कृतिर्वा ॥ अन्वयः-वा खण्डद्वयस्याभिहतिः द्विनिघ्नी तत्खण्डवर्गैक्ययुता कृतिः स्यात् ॥ अर्थः-अथवा जिस अंकका वर्ग करना हो उसके दो खंड करके उनको परस्पर गुणा करके द्विगुणा करे फिर उन दोनों खण्डोंका अलग २ वर्ग करके पहले द्विगु- णित अंकमें जोड देनेसे वर्गफल प्राप्त होता है ॥ उदाहरण.- (क) उपरोक्त रीति के अनुसार

मूलराशिदोखण्डपरस्पर गुणाद्विगुणादोनोंका वर्गजोड
५।४<br><br> --- <br> २०२० <br><br> --- <br> ४०५ ४ <br> ५ ४ <br> --- --- <br> २५ १६४० <br> २५ <br> १६
९ के पाँच, चार ५।४ ऐसे दोखंड किये.
वर्गफल ८१
फिर पाँच ५ और चार ४ को परस्पर गुणा किया तब बीस २० हुए. उनको द्विगुणा
किया तो ४० चालीस हुए. फिर दोनों खंडोंका अलग २ वर्ग किया. अर्थात् ५ का
वर्ग किया तब २५ पचीस हुए और ४ का वर्ग किया तब १६ सोलह हुए.
इनको ४० चालीसमें जोड दिया तब ८१ हुए. यही ९ नौका वर्ग फल है ॥
( ख ) अथवा १४ चौदहके ६ । ८ छ और आठ दो खंड किये.
तदनन्तर ६ और ८ दोनों खंडोंको परस्पर गुणा किया तब ४८ अडतालीस हुए,
उनको द्विगुणा किया तब ९६ छियानवे हुए फिर दोनों खंडोंका अलग अलग वर्ग
किया अर्थात् ६ का वर्ग किया तो ३६ छत्तीस हुए और ८ आठका वर्ग किया
तो ६४ चौंसठ हुए इन दोनों वर्ग-फलोंको ९६ में जोड दिया तब १९६ एकसौ
छियानवे हुए यही वर्गफल हुआ ।
मूलराशि.दोखंड.परस्परगुणा.द्विगुणादोनों खंडका वर्गजोड
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१४६।८<br><br> --- <br> ४८४८ <br><br> --- <br> ९६६ ८ <br> ६ ८ <br> --- --- <br> ३६ ६४९६ <br> ३६ <br> ६४
वर्गफल १९६