लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३६ ) लीलावती । न्यासः– २ २ १ १ ३ ७ सवर्णिते जातम्– ७/३ १५/७ गुणिते च जातम्– ५/१ गुणक. गुण्य फैलाव-- २ २ यहाँ दोनों स्थानमें भागानुबन्धकी रीतिसे सवर्णन किया. १/३ १/७ अर्थात् पहली राशिके हर ३ तीनसे २ दोको गुणा तब छ ६ हुआ. उसमें अंश १ एकको जोड दिया और हर वैसा ही रहा तब ७/३ पहली राशिका सवर्णन हुआ फिर उसी रीतिके अनुसार द्वितीय राशिके हर ७ सातको दो २ से गुणा तब १४ चौदह हुआ. इसमें अंश १ एकको जोड दिया तब १५/७ ऐसा रूप हुआ अर्थात् गुणक गुण्यका ७/३ १५/७ यह आकार हुआ. अब उपरोक्त नियमानुसार दोनों अंशों तथा दोनों हरोंको परस्पर गुणा किया तब १०५/२१ यह रूप हुआ अब अंश १०५ एकसौ पाँचमें २१ इक्कीसका भाग दिया तब ५/१ पांच लब्धि हुआ यही फल है ॥ गुणकः गुण्यः न्यासः– १/२ १/३ गुणिते जातम् १/६ फैलाव-- १/२ १/३ यहाँ उपरोक्त नियमानुसार अंश तथा हरोंको परस्पर गुणा किया तब १/६ ऐसा रूप हुआ. अब यहाँ अंशमें हरका भाग तो लग ही नहीं सकता इस कारण यही १/६ उत्तर हुआ ॥ अथ भिन्नभागहारे करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्– भिन्न भाग करनेकी रीति आधे श्लोकमें:-- छेदं लवञ्च परिवर्त्य हरस्य शेषः कार्योऽथ भागहरणे गुणनाविधिश्च ॥ अन्वयः-अथ भागहरणे छेदं लवञ्च परिवर्त्य शेषः गुणनाविधिः कार्यः ॥ अर्थः-भिन्न भाग करनेमें भाजकके हरके स्थानमें अंश लिखे और अंशके स्थानमें हर लिखे और बाकी रीति गुणाकी करे अर्थात् अंशोंको तथा हरोंको परस्पर गुणा करके अंशगुणित लब्धि में हरगुणित लब्धिका भाग देनैसे जो लब्धि होती है वही भिन्न भागकी लब्धि होती है ॥