लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६४ ) लीलावती । २० राशिको दृश्य मानकर दृश्य २० में गुणे ८ के आधेका वर्ग १६ को जोडा, तब ३६ छत्तीस हुआ. इसके मूल ६ में गुणका आधा ४ जोडा तब १० दश हुआ, इसका वर्ग करनेसे १०० सौ हुआ. इतने ही वाणोंको अर्जुनने धारण किया था, क्योंकि आधे ५० से उसके वाण काटे. चतुर्गुण मूल ४० चालीससे घोडोंको मारा, छ ६ से सारथीको मारा और तीन ३ से छत्र, ध्वजा, धनुष काटा और एकसे उसका शिर काटा. सब जोडे तब वही १०० सौ हुए. अपि च–और भी उदाहरण- अलिकुलदलमूलं मालतीं यातमष्टौ निखिलनवमभागा- श्चालिनीभृंगमेकम् ॥ निशि परिमललुब्धं पद्ममध्ये निरुद्धं प्रति रणति रणंतं ब्रूहि कान्तेऽलिसंख्याम् ॥ ५ ॥ अन्वयः-हे कान्ते ! अलिकुलदलमूलं मालतीं यातम् । निखिलनवमभागः च अष्टौ मालतीं याताः । एक आलिनी निशि परिमललुब्धं पद्ममध्ये निरुद्धं रणन्तम् एकं भृङ्गं प्रतिरणति तर्हि अलिसंख्यां ब्रूहि ॥ ५ ॥ अर्थः-हे प्रिये ! जो भ्रमरोंका समूह था उसके आधेका मूल म.लतीपर जा बैठा और सब समूहका नवमांश आठगुणा भी मालती ही पर जो बैठा और भ्रमरी रात्रिमें सुगन्धिके कारण कमलके बीचमें फँसे हुए शब्द करनेवाले भ्रमरके शब्दका प्रतिशब्द कर रही थी तो कहो सब भ्रमरोंकी संख्या कितनी थी ? ॥ ५ ॥ अत्र निखिलराशिनवांशाष्टकं राश्यर्द्धं मलं च राशेर्र्ऋण रूपं दृश्यञ्च एतद्गणदृश्यमर्द्धितं राश्यर्द्धस्य भवतीति ॥ अर्थः-इसी उदाहरणमें नवमांश आठ गुणा तो पूरी राशिका है और मूल आधी राशिका यह मिलाकर सारी राशिसे हीन किये हैं तब दृश्य २ दो रहे हैं और यहां आधी राशिका मूल लिया है इस कारण दृश्य २ दोको भी आधा कर लेना चाहिये. फिर इससे पूर्वोक्त रीतिसे आधी राशि आवेगी. उससे दूनी कर लेनेसे पूरी राशि होगी ॥ तथा न्यासः- भागाः ८/९ मूलगुणकः १ दृश्यम् १ राश्य- र्द्धस्य स्यादिति भागन्यासोऽत्र प्राग्वल्लब्धम् राशिदलम् ३६ एतद्द्विगुणितमलिकुलमानम् ७२ ॥