लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
पृष्ठ 82, कुल 268 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६६ ) लीलावती । देनेसे ऐसा रूप हुआ ९००/१६ यही दृश्य राशि ह. इसमें गुण २७/२ के आधे २७/४ का वर्ग ७२९/१६ जोडा. समच्छेद करके यथा ९००/१ = ७२९/१६ = १४४००/१६ + ७२९/१६ = १५१२९/१६ इसका मूल लिया तब १२३/४ यह मिला इसमें गुण २७/४ का आधा २७/४ हीन किया तब २७/४ - १२३/४ समच्छेद है इसलिये घटानेसे ९६/४ ऐसा होनेपर अंशमें हरका भाग देकर राशिको शोधा तब २४ चौबीस हुआ इसका वर्ग किया तब ५७६ पांचसौ छियत्तर हुआ यही वह राशि है जिसका उक्त क्रिया करनेसे १२.०० बारहसौ होता है. क्योंकि ५७६ का मूल २४ को १८ अठारह गुणा करनेसे ४३२ चारसौ बत्तीस हुआ और तृतीयांश एकसौ बानवे १९२ हुआ. इनमें राशि ५७६ को जोडा तब यही १२.०० हुए ॥ इति गुणकर्म ॥ अथ त्रैराशिके करणसूत्रं वृत्तम्- अब त्रैराशिककी विधि एक श्लोकमें कहते हैं:- प्रमाणमिच्छा च समानजाती आद्यन्तयोः स्तः फलमन्य- जातिः ॥ मध्ये तदिच्छाहतमाद्यहत्स्यादिच्छाफलं व्यस्त- विधिर्विलोमे ॥ १७ ॥ अन्वयः-प्रमाणम् इच्छा च समानजाती भवतः ते आद्यन्तयोः स्थाप्ये । फलम् अन्यजातिः भवति । तत् मध्ये स्थाप्यम् । तत् इच्छा हतम् आद्यहृत इच्छाफलं स्यात् । विलोमे व्यस्तविधिः कार्य्यः ॥ १७ ॥ अर्थः-प्रमाण और इच्छा यह एक जातिके होते हैं. उनको आदि और अन्तमें रक्खे और फल अन्य जातिका होता है उसको मध्यमें रक्खें. और फलको इच्छा से गुणा करे और प्रमाणका भाग दे. तब जो लब्धि आवे उसको इच्छाफल जाने और यदि विलोकका उदाहरण हो तो व्यस्तविधि करे ॥ १७ ॥ उदाहरणम्- कुंकुमस्य सदलं पलद्वयं निष्कसप्तमलवैस्त्रिभिर्यदि ॥ प्राप्यते सपदि हे वणिग्वर ब्रूहि निष्कनवकेन तत्कियत्॥ १ ॥ अन्वयः-हे वणिग्वर ! यदि त्रिभिः निष्कसप्तमलवैः कुंकुमस्य सदलं पलद्वयं प्राप्यते तर्हि तत् निष्कनवकेन कियत् प्राप्यते इति त्वं सपदि ब्रूहि ॥ १ ॥ अर्थः-हे वैश्यवर्ख ! यदि निष्कके तीन सातवें ३/७ भागोंका कुंकुमका ढाई ५/२ पल मिलता है तो वही कुंकुम ९ नौ निष्कका कितना मिलेगा यह तुम शीघ्र कहो ॥ १ ॥