लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७४ ) लीलावती । मूलधनार्थं न्यासः- १ | १२ १०० | ० ५ | ४८ — | ५ पूर्ववल्लब्धं मूलधनम् १६ एवं सर्वत्र ॥ फैलाव-तीसरे उदाहरणमें एक महीनेमें सौपै पांच फल मिलता है.? | १२ यह पहली पंक्ति है तो बारह १२ महीनेमें अडतालीसका पञ्चमांश | १०० | ० ५ | ४८ — | ५ कितने मूल धनपर मिलेगा, यह दूसरी पंक्ति हुई ऐसा साधारण न्यास हुआ. यहां ऊपर कहे हुए नियमके अनुसार पहली पंक्तिके फल पांचको दूसरी पंक्तिमें लिखा और दूसरी पंक्तिके फल अडतालीसके पञ्चमांशको पहली १२ पंक्तिमें लिखा. अब पहली पंक्तिमें हर आगया उसको दूसरी पंक्तिमें ६०० | ० | ५ ४८ | ५ लिखा. फिर बहुत राशियोंके घात ४८०० में थोडी राशियोंके घात ३०० का भाग दिया तब १६ सोलह लब्धि हुआ, यही मूलधन है. इसी प्रकार सब जगह जानना ॥ उदाहरणम्- सत्र्यंशमासेन शतस्य चेत्स्यात्कलांतरं पंच सपंचमांशाः ॥ मासैस्त्रिभिः पंचलवाधिकैस्तत्सार्द्धद्विषष्टेः फलमुच्यतां किम् २॥ अन्वयः-हे सखे ! चेत् सत्र्यंशमासेन शतस्य सपञ्चमांशाः पञ्च कलान्तरं स्यात् तर्हि पञ्चलवाधिकैः त्रिभिः मासैः सार्द्धद्विषष्टेः तत् फलं किं स्यात् ! इति उच्यताम् ? ॥२॥ अर्थः-हे मित्र ! यदि तीसरे अंश सहित एक मास १ १/३ में सौ १०० का ब्याज पञ्चमांश सहित पांच ५ १/५ होता है तो पञ्चमांशसहित तीन मास ३ १/५ में अर्द्धांश सहित बासठ ६२ १/२ का ब्याज कितना होगा सो कहो? न्यासः- १ १/३ | ३ १/५ | छेदघ्नरूपेष्विति ४/३ | १६/५ १०० | ६२ १/२ | कृते न्यासः- १०० | १२५/२ ५ १/५ | ० | २६/५ | ०